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योनि कूट विचार

नक्षत्र योनियों का विचार

अश्विन्मम्बुपयोर्हयो निगदितः स्वात्यर्कयोः कासरः
सिंहो वस्वजपाद्भयोः समुदितो याम्यान्त्ययोः कुञ्जरः ।
मेषो देवपुरोहितानलभयोः कर्णाम्बुचरो वानरः
स्याद्वैश्वाभिजितोस्तथैव नकुलश्चान्द्राब्जयोन्योरहिः ।। २५ ।।

ज्येष्ठामैत्रभयोः कुरंग उदितो मूलार्द्रयोः श्वा तथा
मार्जारोऽदितिसार्पयोरथ मघायोन्योस्तथैवोन्दुरुः ।
व्याघ्रो द्वीशभचित्रयोरपि च गौरर्यम्णबुध्न्यर्क्षयो-
र्योनिः पादगयोः परस्परमहावैरं भयोन्योस्त्यजेत् ।। २६ ।।

मुख्य बातें:
  • योनि कूट के अधिकतम 4 गुण होते हैं।
  • 27 नक्षत्रों, अथवा अभिजित सहित 28 नक्षत्रों, को 14 प्रतीकात्मक योनियों में विभाजित किया गया है।
  • समान योनि होने पर 4 गुण और महावैर या परस्पर शत्रु योनि होने पर 0 गुण मिलते हैं।
  • मुहूर्त चिंतामणि महावैर योनि वाले नक्षत्रों के बीच विवाह से विशेष रूप से मना करता है।
  • योनि कूट का संबंध शारीरिक अनुकूलता, दांपत्य निकटता और परस्पर आकर्षण से माना जाता है।

नक्षत्र और उनकी योनियाँ

योनि नक्षत्र पुरुष / स्त्री वर्ग
अश्वअश्विनी, शतभिषापुरुष
गजभरणी, रेवतीस्त्री
मेषपुष्य, कृत्तिकास्त्री
सर्परोहिणी, मृगशिरापुरुष
श्वानमूल, आर्द्रापुरुष
बिल्लीआश्लेषा, पुनर्वसुस्त्री
मूषकमघा, पूर्वाफाल्गुनीपुरुष
गायउत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपदस्त्री
महिषस्वाती, हस्तस्त्री
व्याघ्रविशाखा, चित्रापुरुष
हिरणज्येष्ठा, अनुराधास्त्री
वानरश्रवण, पूर्वाषाढ़ापुरुष
नेवलाउत्तराषाढ़ा, अभिजितस्त्री
सिंहधनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपदपुरुष

महावैर योनि जोड़ियाँ — परंपरानुसार वर्जनीय

के 26वें श्लोक का अंतिम भाग मुहूर्त चिंतामणि कहता है: परस्परमहावैरं भयोन्योस्त्यजेत्। इसका अर्थ है कि परस्पर महावैर योनियों के नक्षत्रों में जन्मे वर-वधू का विवाह वर्जित करना चाहिए। निम्न सात जोड़ियों को योनि कूट में 0 गुण मिलते हैं।

# महावैर जोड़ी संबंधित नक्षत्र
1अश्व ↔ महिषअश्विनी, शतभिषा ↔ स्वाती, हस्त
2गज ↔ सिंहभरणी, रेवती ↔ धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद
3मेष ↔ वानरपुष्य, कृत्तिका ↔ श्रवण, पूर्वाषाढ़ा
4सर्प ↔ नेवलारोहिणी, मृगशिरा ↔ उत्तराषाढ़ा, अभिजित
5श्वान ↔ हिरणमूल, आर्द्रा ↔ ज्येष्ठा, अनुराधा
6बिल्ली ↔ मूषकआश्लेषा, पुनर्वसु ↔ मघा, पूर्वाफाल्गुनी
7गाय ↔ व्याघ्रउत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद ↔ विशाखा, चित्रा

योनि कूट गुण निर्धारण नियम

संबंध गुण पारंपरिक फल
समान योनि4उत्तम — पूर्ण शारीरिक और स्वाभाविक अनुकूलता
मित्र योनियाँ3शुभ
सम योनियाँ2मध्यम
शत्रु योनियाँ1अल्प अनुकूलता; मतभेद की संभावना
महावैर योनियाँ0परंपरानुसार वर्जनीय

टिप्पणी: समान योनि के लिए पूरे 4 गुण और महावैर जोड़ी के लिए 0 गुण देने पर प्राचीन ग्रंथों में सामान्य सहमति है। मध्यवर्ती वर्गीकरण—मित्र (3), सम (2) और शत्रु (1)—की व्याख्या मुहूर्त चिंतामणि, ज्योतिर्निबंध तथा संबंधित ग्रंथों की टीकाओं में कुछ भिन्न मिलती है। इसलिए व्यवहारिक मिलान में महावैर जोड़ियों की पहचान को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

पुरुष और स्त्री योनि का विचार

परंपरागत मत के अनुसार वर का नक्षत्र पुरुष योनि और वधू का नक्षत्र स्त्री योनि का हो, तो श्रेष्ठ माना जाता है। दोनों पुरुष योनियाँ हों तो विचारों में अधिक टकराव और दोनों स्त्री योनियाँ हों तो निकटता अधिक किंतु निर्णय शक्ति अपेक्षाकृत कम मानी जाती है। यह सहायक विचार है; इसे अकेले आधार बनाकर निर्णय नहीं करना चाहिए।

योनि दोष निवारण

योनि कूट में कम गुण आने पर दोष की तीव्रता घट सकती है, यदि चंद्र राशि स्वामियों में उत्तम ग्रह मैत्री हो, नाड़ी और भकूट दोषरहित हों, अथवा वर-वधू के नवांश लग्न स्वामी परस्पर मित्र हों। सामान्यतः ये शमन नियम महावैर योनि पर लागू नहीं माने जाते।

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