विवाह मिलान में अष्टकूट
अष्टकूट मिलान में गुणों का विभाजन
वर्णों वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम् ।
गणमैत्रं भकूटं च नाडी चैते गुणाधिकाः ।।२१।।
- अष्टकूट हैं—वर्ण (1), वश्य (2), तारा (3), योनि (4), ग्रह मैत्री (5), गण (6), भकूट (7) और नाड़ी (8)।
- कुल अधिकतम 36 गुण होते हैं।
- 18 या उससे अधिक गुण सामान्यतः विवाह के लिए स्वीकार्य माने जाते हैं।
आठ कूट हैं—1. वर्ण, 2. वश्य, 3. तारा, 4. योनि, 5. ग्रह मैत्री, 6. गण मैत्री, 7. भकूट और 8. नाड़ी। प्रत्येक अगला कूट पिछले कूट से एक गुण अधिक रखता है। वर्ण के 1, वश्य के 2, तारा के 3, योनि के 4, ग्रह मैत्री के 5, गण मैत्री के 6, भकूट के 7 और नाड़ी के 8 गुण होते हैं।
व्याख्या: इस अंकगणितीय सूत्र के अनुसार, जिसे सैक पदघ्न पदार्थम्कहा जाता है, कुल गुण इस प्रकार हैं:
$$\frac{(8+1) \times 8}{2} = 36$$
“गुण” अथवा “अंक” भावी दंपति के वैवाहिक जीवन के किसी विशेष पक्ष को दर्शाने वाला मानदंड है। जब वर और वधू के कुल मिलान में 18 या अधिक गुण प्राप्त हों, तो उनका नक्षत्र मेल सामान्यतः विवाह के लिए उपयुक्त माना जाता है। 18 से जितने अधिक गुण हों, पारंपरिक अष्टकूट अनुकूलता उतनी ही उत्तम मानी जाती है।
ज्योतिर्निबंध के अनुसार 16 गुण अनुपयुक्त, 17 से 20 मध्यम, 21 से 31 उत्तम और 31 से 36 अत्युत्तम माने गए हैं। यदि अशुभ भकूट योग हो, तो 20 तक अशुभ, 21 से 25 मध्यम, 26 से 30 उत्तम और 30 से 36 अत्युत्तम माना जाता है।
विषय-सूची
- 1. आश्लेषा आदि नक्षत्र दोष निवारण
- 2. विवाह मिलान में अष्टकूट — परिचय
- 3. 1. वर्ण कूट विचार
- 4. 2. वश्य कूट विचार
- 5. 3. तारा कूट विचार
- 6. 4. योनि कूट विचार
- 7. 5. ग्रह मैत्री कूट विचार
- 8. 6. गण कूट विचार
- 9. 7. भकूट विचार और दोष निवारण
- 10. 8. नाड़ी कूट विचार और दोष निवारण
- 11. वर्ग कूट और अन्य मिलान विचार
- 12. कुज दोष विचार और शास्त्रीय निवारण नियम

