देवी नवरात्र — नौ दिनों की आराधना
नवरात्र का दिन 8 — महागौरी — दुर्गाष्टमी
समीक्षा और संशोधन: 24 सितम्बर 2026
देवी का स्वरूप और आराधना का भाव
महागौरी नवदुर्गा का आठवाँ स्वरूप हैं। सौम्यता, शुचिता और शान्ति के भाव से उनकी आराधना होती है। महाष्टमी दुर्गापूजा का प्रमुख दिन है; नवदुर्गा-क्रम में यहाँ महागौरी की पूजा उससे सम्बद्ध है।
देवीकवच में शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नवदुर्गा के नाम क्रम से आते हैं। इस लेखमाला में उसी नवदुर्गा-आराधना क्रम को लिया गया है। क्षेत्रीय मन्दिरों में बालात्रिपुरसुन्दरी, अन्नपूर्णा, ललिता, महालक्ष्मी आदि के अलंकारों का अपना क्रम होता है; उसे इस सूची से अनिवार्य रूप से समान नहीं मानना चाहिए।
इस पूजा का दिन कैसे देखें?
शारदीय नवरात्र निज आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से और वासन्तिक नवरात्र चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होते हैं। यहाँ दिन की संख्या नवदुर्गा-क्रम बताती है। तिथि के क्षय या वृद्धि से यह क्रम लगातार आने वाली अंग्रेजी तारीखों से अलग हो सकता है। अपने स्थान की तिथि और परम्परा के अनुसार उत्सव का निर्णय देखें।
इस दिन ध्यान रखने योग्य बातें
महाष्टमी-निर्णय में सप्तमीवेध, सूर्योदय की व्याप्ति और नवमीक्षय जैसे विचार हैं। सन्धिपूजा अष्टमी और नवमी की वास्तविक सन्धि पर होती है, प्रतिवर्ष एक ही घड़ी पर नहीं। कन्यापूजा अष्टमी या नवमी को कुलाचार के अनुसार होती है। उपवास के विषय में ग्रन्थभेद होने से सभी के लिए एक ही बाध्यता नहीं दी जा रही है।
घर में सरल पूजाक्रम
- पूजास्थान को स्वच्छ करके कुलाचार के अनुसार देवी के चित्र या विग्रह को सजाएँ। पहले से स्थापित नवरात्र-कलश की प्रतिदिन नई स्थापना आवश्यक नहीं है।
- दीप जलाकर उस दिन के देवी-नाम का स्मरण और पूजा का संकल्प करें।
- गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और अपने आचार के अनुकूल नैवेद्य अर्पित करें। प्रतिदिन एक निश्चित वस्त्र-रंग या पकवान ही अनिवार्य होने का सामान्य नियम नहीं है।
- नामस्मरण या परिचित देवी-स्तोत्र का पाठ करें। विधिवत् चण्डीपाठ और होम के लिए उनका निर्धारित क्रम अपनाएँ।
- आरती, नमस्कार और क्षमाप्रार्थना करके प्रसाद बाँटें।
सरल नामस्मरण
ॐ देव्यै महागौर्यै नमः।
यह देवी-नाम द्वारा नमस्कार है। जिस मन्त्र-साधना में दीक्षा आवश्यक हो, उसके लिए यह गुरूपदेश का विकल्प नहीं है।
उपवास और कुलाचार
नवरात्र में देवीपूजा प्रधान है। उपवास, एकभुक्त या नक्त जैसे नियम संकल्प, सामर्थ्य और कुलाचार के अनुसार होते हैं। यह लेख सभी के लिए निर्जल उपवास नहीं बताता। पारणा का निर्णय सम्बन्धित तिथि और पारिवारिक विधि से करें, केवल दिन की संख्या से नहीं।
ग्रन्थाधार
देवीकवच के श्लोक 3–5 नवदुर्गा-नामक्रम का आधार हैं। तिथि और आचरण के भेदों के लिए धर्मसिन्धु तथा निर्णयसिन्धु के आश्विन-प्रकरण देखे गए हैं। स्वरूप-वर्णन प्रचलित आराधना-रूपों का परिचय है; सभी विवरण कवच के उन्हीं तीन श्लोकों में नहीं हैं।

