गण कूट विचार और शास्त्रीय निवारण नियम
गण विभाजन, गुण तालिका और दोष निवारण
रक्षोनरामरगणाः क्रमतो मघाहिवस्विन्द्रमूलवरुणानलतक्षराधाः ।
पूर्वोत्तरात्रयविधातृयमेशभानि मैत्रादितीन्दुहरिपौष्णमरुल्लघूनि ।। २९ ।।
- गण कूट के अधिकतम 6 गुण होते हैं।
- 27 नक्षत्रों को देव, मनुष्य और राक्षस गणों में नौ-नौ करके विभाजित किया गया है।
- वर-वधू दोनों का गण समान हो तो पूरे 6 गुण मिलते हैं।
- देव गण की वधू और राक्षस गण के वर का मेल अत्यंत दोषपूर्ण माना जाता है तथा इसमें 0 गुण मिलते हैं।
- राशि स्वामियों की मैत्री अथवा उत्तम तारा शुद्धि होने पर गण दोष नष्ट हो सकता है।
गण के अनुसार नक्षत्र विभाजन
| गण | सामान्य स्वभाव | नक्षत्र (9) |
|---|---|---|
| देव गण | सात्त्विक, शांत और धर्मनिष्ठ | अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाती, अनुराधा, श्रवण, रेवती |
| मनुष्य गण | राजसिक, व्यावहारिक और समायोजनशील | भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद |
| राक्षस गण | तामसिक, उग्र और स्वतंत्र | कृत्तिका, आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा |
गण कूट गुण तालिका
| वधू \ वर | देव | मनुष्य | राक्षस |
|---|---|---|---|
| देव | 6 | 6 | 0 |
| मनुष्य | 5 | 6 | 0 |
| राक्षस | 1 | 0 | 6 |
व्याख्या: मुख्य दोष तब माना जाता है जब वर का गण वधू के गण की तुलना में निम्न अथवा कम अनुकूल हो। इसलिए देव गण की वधू और राक्षस गण के वर के मेल को 0 गुण देकर अत्यंत अशुभ कहा गया है। इसके विपरीत राक्षस गण की वधू और देव गण के वर को 1 गुण मिलता है। यह भी असंगति दर्शाता है, पर इसकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है। मनुष्य–राक्षस गण का मेल भी सामान्यतः वर्जनीय माना गया है।
गण कूट मुख्यतः स्वभाव, व्यवहार और पारिवारिक जीवन में परस्पर समायोजन की क्षमता को दर्शाता है। इसका संबंध स्वास्थ्य या आयु की अपेक्षा मानसिक और स्वभावगत अनुकूलता से अधिक है।
प्राचीन ग्रंथों में गण दोष निवारण नियम
1. पीयूषधारा — ग्रह मैत्री से गण दोष निवारण
rāśyadhipe mitryamupeyuṣi melanasya tārāviśuddhau ca gaṇasya doṣaḥ ।
na vidyate traijagatīprasiddhaḥ sadbhirbudhaiścāpi nirūpitoऽyam ।।
अर्थ: प्राचीन आचार्यों के अनुसार वर-वधू की चंद्र राशियों के स्वामी परस्पर मित्र हों अथवा तारा शुद्धि संतोषजनक हो, तो गण दोष लागू नहीं होता।
2. ज्योतिर्निबंध — वर्ण आधारित अपवाद
vaiśya śūdrāla śīleṣu gaṇadoṣo na vidyate ।
grahamaitrī yadā pūrṇā gaṇadoṣo na vidyate ।।
अर्थ: वैश्य और शूद्र वर्ण के जातकों में गण दोष को समान महत्त्व नहीं दिया जाता। ग्रह मैत्री पूर्ण हो और पूरे 5 गुण मिलें, तो गण दोष पूर्णतः नष्ट माना जाता है।
3. ज्योतिर्निबंध — नक्षत्र अथवा राशि भेद का अपवाद
rukṣaikye rāśibhede ca rāśyaikye rukṣabhinnake ।
nāḍīdoṣo na vidyate tathā gaṇakṛto raṇaḥ ।।
अर्थ: वर-वधू का नक्षत्र एक हो और चंद्र राशियाँ अलग हों, अथवा चंद्र राशि एक हो और नक्षत्र अलग हों, तो नाड़ी दोष तथा गण दोष दोनों लागू नहीं होते।
4. वसिष्ठ संहिता — वर्णानुसार दोष की प्रधानता
viprāṇāṃ nāḍīdoṣastu kṣatriyāṇāṃ bhakūṭakam ।
vaiśyānāṃ gaṇadoṣastu śūdrāṇāṃ varṇadoṣakaḥ ।।
अर्थ: गण दोष विशेष रूप से वैश्य वर्ण के लिए प्रमुख माना गया है। अन्य वर्णों में असंगति होने पर भी इसकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है।
विषय-सूची
- 1. आश्लेषा आदि नक्षत्र दोष निवारण
- 2. विवाह मिलान में अष्टकूट — परिचय
- 3. 1. वर्ण कूट विचार
- 4. 2. वश्य कूट विचार
- 5. 3. तारा कूट विचार
- 6. 4. योनि कूट विचार
- 7. 5. ग्रह मैत्री कूट विचार
- 8. 6. गण कूट विचार
- 9. 7. भकूट विचार और दोष निवारण
- 10. 8. नाड़ी कूट विचार और दोष निवारण
- 11. वर्ग कूट और अन्य मिलान विचार
- 12. कुज दोष विचार और शास्त्रीय निवारण नियम

