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हिन्दू पंचांग में क्षय मास

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मुख्य बिन्दु (Key Takeaways):

  • परिभाषा: एक ही चन्द्रमास में दो सूर्य संक्रान्तियां होने पर क्षय मास बनता है (पिछला 1983 में था, अगला 2124 में होगा)।
  • अनुमत संस्कार: नामकरण, सीमन्त और अन्नप्राशन जैसे समयबद्ध संस्कार यदि इसी मास में देय हों और टालने से अवधि निकलती हो, तो किए जा सकते हैं।
  • वर्जित कार्य: विवाह, गृह प्रवेश, देव-प्रतिष्ठा जैसे नए ऐच्छिक व दीर्घकालिक मांगलिक कार्य शुद्ध मास तक टालने चाहिए।
  • श्राद्ध नियम: अन्त्येष्टि कभी स्थगित नहीं होती। वार्षिक श्राद्ध का मास मृत्यु वाली तिथि के पहले या दूसरे खगोलीय आधे भाग से तय होता है।

हिन्दू चान्द्र-सौर पंचांग चन्द्रमासों को सौर वर्ष के साथ समन्वित रखता है। सूर्य जब एक राशि से अगली राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रान्ति कहते हैं। सामान्यतः दो लगातार अमावास्याओं के बीच एक संक्रान्ति होती है। इस सामान्य सम्बन्ध में परिवर्तन होने पर अधिक मास या अत्यन्त दुर्लभ क्षय मास बनता है।

क्षय मास किसी पंचांगकार द्वारा मनमाने ढंग से हटाया हुआ महीना नहीं है। इसका निर्णय लगातार दो चन्द्र-मास सीमाओं के ठीक समय और उनके बीच हुई निरयण सूर्य की राशि-प्रवेश संक्रान्तियों की संख्या से होता है।

क्षय मास की गणना कैसे होती है?

  • एक भी सूर्य संक्रान्ति न हो: अधिक मास या अतिरिक्त चन्द्रमास।
  • एक संक्रान्ति हो: शुद्ध या सामान्य चन्द्रमास।
  • दो संक्रान्तियां हों: क्षय मास या लुप्त मास।

भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में कहा है: असंक्रान्तिमासोऽधिमासः ... द्विसंक्रान्तिमासः क्षयाख्यः। अर्थात जिस चन्द्रमास में संक्रान्ति न हो वह अधिक मास और जिसमें दो संक्रान्तियां हों वह क्षय मास कहलाता है।

सूर्य की स्पष्ट गति एक समान नहीं रहती और चन्द्रमास की अवधि भी हर बार बराबर नहीं होती। इसलिए 19, 122 या 141 वर्षों की किसी स्थिर आवृत्ति को गणना-सूत्र नहीं माना जा सकता। प्रत्येक अमावास्या से अगली अमावास्या के बीच वास्तविक संक्रान्तियों की गणना आवश्यक है।

क्षय मास कब हो सकता है?

सिद्धान्त शिरोमणि के अनुसार क्षय मास कार्तिक से आरम्भ होने वाले तीन मासों की सीमित अवधि में ही सम्भव है। वही श्लोक बताता है कि क्षय मास वाले वर्ष में पंचांग-सन्तुलन के लिए दो अधिक मास भी आते हैं। अमान्त और पूर्णिमान्त परम्पराओं अथवा क्षेत्रीय नाम-पद्धति से प्रदर्शित मास-नाम बदल सकते हैं, पर सॉफ्टवेयर का मूल परीक्षण यही है: सम्बद्ध दो चन्द्र-मास सीमाओं के बीच दो सौर राशि-प्रवेश हुए या नहीं।

पिछले और अगले क्षय मास के वर्ष

1700 से 2400 ईस्वी के बीच सामान्यतः गणित क्षय मास इन ग्रेगोरियन वर्षों में पड़ते हैं:

वर्ष 2026 के सन्दर्भ में
1823 पुराना ऐतिहासिक अवसर
1963 पुराना ऐतिहासिक अवसर
1983 सबसे हाल का पिछला क्षय मास
2124 अगला क्षय मास
2284 उसके बाद का अनुमानित अवसर

इस प्रकार 2026 की दृष्टि से पिछला क्षय मास 1983 में था और अगला 2124 में अपेक्षित है। 1823 की घटना 1822 में आरम्भ हुए चान्द्र-सौर वर्ष से सम्बन्धित बताई जा सकती है और कुछ प्रकाशन 1963 की घटना को 1963–64 कहते हैं। तालिका में उस ग्रेगोरियन नागरिक वर्ष को रखा गया है जिसमें वास्तविक क्षय चन्द्रमास पड़ा।

धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु का आशय

धर्मसिन्धु के प्रथम परिच्छेद के मलमास-विचार में क्षय मास का उदाहरण, उसके आगे-पीछे के अधिक मास, दो मास-नामों का व्यवहार और वर्ज्य-अवर्ज्य कर्मों का निर्णय दिया गया है। “सर्व कर्म वर्जित” कथन को उसके धर्मशास्त्रीय सन्दर्भ से अलग करके सभी कर्तव्यों की समाप्ति नहीं समझना चाहिए। निषेध मुख्यतः नए, वैकल्पिक, काम्य और दीर्घकालीन शुभ फल के लिए आरम्भ किए जाने वाले मंगल कार्यों पर है।

परामर्श की गई निर्णयसिन्धु की नेपाली आवृत्ति/अध्ययन के §3.2 “मलमास विचार” में नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त, मृत्यु-सम्बन्धी और समयबद्ध कर्मों को जारी रखने का विवेचन है। गर्भाधान से अन्नप्राशन तक संस्कारों की श्रृंखला का उल्लेख महत्वपूर्ण है। इसके अन्तर्गत पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण और अन्नप्राशन आते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि क्षय मास का प्रत्येक दिन इन संस्कारों के लिए शुभ है। इसका अर्थ है कि यदि शास्त्र में निर्धारित प्राकृतिक आयु या अवधि इसी मास में पूरी हो रही हो, तो केवल मास के कारण उस उचित समय को नष्ट न किया जाए।

मुहूर्त चिन्तामणि का नियम

राम दैवज्ञ रचित मुहूर्त चिन्तामणि के श्लोक 46–47 में न्यूनाधिमासे तथा कहकर न्यून/क्षय और अधिक मास में आरम्भ न किए जाने वाले कार्यों की सूची दी गई है। इसमें विवाह, उपनयन, मुण्डन, देव-प्रतिष्ठा, नए घर में प्रवेश, महादान, पहली तीर्थयात्रा, दीक्षा और अग्नि-स्थापना जैसे कार्य हैं।

अतिपन्नशिशुसंस्कारान् पद ऐसे बाल-संस्कारों की ओर संकेत करता है जिनका निर्धारित समय पहले ही निकल चुका है। अतः दो स्थितियां अलग हैं:

  • यदि संस्कार पहले ही बहुत विलम्बित है और क्षय मास के बाद शीघ्र उपयुक्त मुहूर्त उपलब्ध है, तो उसे टालना श्रेयस्कर है।
  • यदि संस्कार की वास्तविक निर्धारित अवधि ही क्षय मास में पड़ती है और टालने से वह अवधि निकल जाएगी, तो समयबद्ध संस्कार के रूप में उसे किया जा सकता है।


किन कार्यों को सामान्यतः टालना चाहिए?

  • विवाह
  • उपनयन, जब कोई अपरिहार्य शास्त्रीय आयु-सीमा न हो
  • नए घर का निर्माण आरम्भ
  • गृह प्रवेश
  • देवता या मन्दिर की प्रतिष्ठा
  • नए बड़े व्रत का आरम्भ या उद्यापन
  • नई संस्था या दीर्घकालीन शुभ परियोजना का आरम्भ
  • पहली तीर्थयात्रा जैसे वैकल्पिक उपक्रम

क्या नामकरण, सीमन्त और अन्नप्राशन कर सकते हैं?

हां, जब उनकी शास्त्र-निर्धारित अवधि क्षय मास में पड़ती हो और टालने से उचित समय निकल जाए, तब वे किए जा सकते हैं। इसे पूरे क्षय मास के लिए सामान्य शुभ-अनुमति नहीं, बल्कि समयबद्ध संस्कार की अवधि बचाने का अपवाद समझना चाहिए।

कर्म क्षय मास में मार्गदर्शन
नामकरण जन्म के बाद निर्धारित समय इसी मास में पड़ता हो तो किया जा सकता है।
सीमन्त गर्भावस्था की उचित अवस्था निकल जाने से पहले किया जा सकता है।
अन्नप्राशन बालक की निर्धारित अन्न-ग्रहण आयु आने पर किया जा सकता है।
पहले से विलम्बित बाल-संस्कार बाद में अच्छा समय उपलब्ध हो तो टालना उचित है।
नित्य पूजा और नित्य कर्म जारी रहेंगे।
जन्म, मृत्यु और अपरिहार्य नैमित्तिक कर्म अपने निर्धारित समय पर किए जाएं।
विवाह, गृह प्रवेश और नया निर्माण उपयुक्त शुद्ध मास तक स्थगित किए जाएं।

अनुमत समयबद्ध संस्कार में भी उपयुक्त तिथि, नक्षत्र, वार और लग्न चुनना तथा प्रमुख मुहूर्त-दोषों से बचना चाहिए। परिवार की वेद-शाखा, क्षेत्र, सम्प्रदाय और पुरोहित के निर्णय का सम्मान आवश्यक है।

क्षय मास में किसी की मृत्यु हो तो श्राद्ध कब करें?

अन्त्येष्टि और मृत्यु के बाद के निर्धारित कर्म केवल क्षय मास के कारण स्थगित नहीं किए जाते। ये वैकल्पिक शुभ कार्य नहीं, मृत्यु की घटना से उत्पन्न अपरिहार्य नैमित्तिक कर्म हैं। दशाह आदि, एकोद्दिष्ट तथा परिवार की वेद-शाखा और परम्परा के अनुसार सपिण्डीकरण अपने-अपने नियत समय पर होना चाहिए।

मृत्यु का मास कैसे तय होगा?

क्षय चन्द्रमास में दो संक्रान्तियां होने के कारण एक ही अवधि के दो मास-नाम होते हैं। मुहूर्त चिन्तामणि की पीयूषधारा टीका जन्म, मृत्यु, जन्मदिन और वार्षिक श्राद्ध के लिए यह विशेष नियम देती है:

  • मृत्यु वर्तमान तिथि के पहले आधे भाग में हो तो दो संयुक्त नामों में पहला मास लिया जाएगा।
  • मृत्यु उसी तिथि के दूसरे आधे भाग में हो तो दूसरा मास लिया जाएगा।

प्रमाण-वाक्य है: तिथ्यर्धे प्रथमे पूर्वोऽपरस्मिन्नपरस्तथा। तिथि के ये दो भाग खगोलीय रूप से सूर्य-चन्द्र कोण के 6°-6° वाले दो करण हैं। इनका अर्थ दोपहर से पहले और दोपहर के बाद नहीं है। मृत्यु का ठीक समय, स्थान तथा तिथि के आरम्भ-अन्त से तिथि-मध्यबिन्दु की गणना करनी होगी।

दिन या रात में मृत्यु होने पर मास कैसे लें?

केवल दिन या रात मास का निर्णय नहीं करते। दिन हो या रात, तिथि-मध्यबिन्दु से पहले मृत्यु होने पर पहला मास और उसके बाद होने पर दूसरा मास लिया जाता है। आधी रात के बाद लेकिन सूर्योदय से पहले मृत्यु हुई हो तो जिन कर्मों में सूर्योदय-आधारित वैदिक वार आवश्यक है, वहां पिछला वार लागू हो सकता है। इससे क्षय-मास का निर्णय नहीं बदलता; उसके लिए वास्तविक तिथि और उसका आधा भाग ही निर्णायक है।

उदाहरण के लिए यदि एक क्षय अवधि मार्गशीर्ष-पौष नामों को मिलाती है, तो एकादशी के पहले आधे में मृत्यु मार्गशीर्ष एकादशी और उसी एकादशी के दूसरे आधे में मृत्यु पौष एकादशी मानी जाएगी। आगे का प्रत्याब्दिक श्राद्ध उसी निर्धारित मास और तिथि में होगा।

मासिक और वार्षिक श्राद्ध

कर्म नियम
अन्त्येष्टि और तत्काल उत्तरक्रिया बिना स्थगन निर्धारित दिन-क्रम में करें।
एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण परिवार की वेद-शाखा और क्षेत्रीय परम्परा में निर्धारित समय पर करें।
मासिक श्राद्ध कालक्रमानुसार जारी रखें; क्षय-वर्ष से जुड़े अधिक मास में विशेष पुनरावृत्ति-नियम हो सकते हैं।
पहला और बाद के वार्षिक श्राद्ध मृत्यु-तिथि और उस तिथि के पहले/दूसरे आधे से निर्धारित मास लें।
पूर्वज का आब्दिक क्षय मास में पड़े रद्द नहीं होता। दोनों संयुक्त मासों के श्राद्ध क्षय मास में किए जा सकते हैं; ठीक समय तिथि-अर्ध नियम से तय होगा।

श्राद्ध चन्द्रिका कहती है कि एक मास में दो संक्रान्तियां होने पर दोनों मासों से सम्बन्धित श्राद्ध उसी क्षय मास में किए जा सकते हैं। परामर्श किए गए निर्णयसिन्धु अध्ययन में भी मृत्यु-कर्म, नित्य श्राद्ध, दर्श श्राद्ध और आवश्यक मासिक कर्म मलमास में जारी रखने का विवेचन है।

महत्वपूर्ण: पंचांग में मास-निर्णय से पहले मृत्यु का ठीक समय और स्थान लेना आवश्यक है। सीमा नागरिक दोपहर नहीं बल्कि उसी तिथि का खगोलीय मध्यबिन्दु है। अमान्त या पूर्णिमान्त पारिवारिक परम्परा के अनुसार योग्य आचार्य/पुरोहित से अन्तिम निर्णय कराएं।

पंचांग और श्राद्ध तिथि फाइंडर में इसे कैसे दिखाना चाहिए?

  • दैनिक पंचांग: दो संक्रान्तियों वाली पूरी अवधि को दोनों मास-नामों के साथ “क्षय मास” दिखाए और तिथि के पहले/दूसरे आधे का नियम समझाए।
  • व्यक्तिगत श्राद्ध तिथि फाइंडर: मृत्यु की तारीख, ठीक समय और स्थान से तिथि-मध्यबिन्दु निकालकर एक निश्चित मृत्यु-मास चुने।
  • मासिक श्राद्ध कैलेंडर: क्षय मास में प्रत्येक तिथि के लिए बताए कि पहला मास किस समय तक और दूसरा मास किस समय के बाद लागू होगा।

निष्कर्ष

क्षय मास वह दुर्लभ खगोलीय स्थिति है जिसमें लगातार दो अमावास्याओं के बीच दो सूर्य संक्रान्तियां होती हैं। विवाह, गृह प्रवेश और प्रतिष्ठा जैसे नए वैकल्पिक मंगल कार्य सामान्यतः टालने चाहिए। नित्य, नैमित्तिक, अपरिहार्य और उचित अवधि निकल जाने वाले समयबद्ध संस्कार नहीं रुकते। इसलिए नामकरण, सीमन्त और अन्नप्राशन की निर्धारित अवधि क्षय मास में हो तो उपयुक्त मुहूर्त में किए जा सकते हैं।

मृत्यु होने पर अन्त्येष्टि स्थगित नहीं होती। भविष्य के वार्षिक श्राद्ध का मास दिन/रात से नहीं, बल्कि मृत्यु वाली तिथि के पहले या दूसरे खगोलीय आधे भाग से निर्धारित होता है।

प्रामाणिक ग्रन्थ, अध्याय और श्लोक-सन्दर्भ

ग्रन्थ अध्याय/श्लोक अथवा संस्करण-स्थान इस लेख में प्रयुक्त विषय
सिद्धान्त शिरोमणि – भास्कराचार्य ग्रहगणित, मध्यमाधिकार, अधिमास-निर्णय भाग, श्लोक 6; विकिस्रोत स्कैन पृष्ठ 129 बिना संक्रान्ति अधिक मास, दो संक्रान्तियां क्षय मास; कार्तिकादि सीमा और दो अधिक मास।
मुहूर्त चिन्तामणि – राम दैवज्ञ निर्णयसागर संस्करण, श्लोक 46–47; पीयूषधारा टीका पृष्ठ 155 पर श्लोक 47 का निर्देश न्यूनाधिमासे तथा के अन्तर्गत विवाह, उपनयन, प्रतिष्ठा आदि नए मंगल कार्यों का निषेध।
मुहूर्त चिन्तामणि–पीयूषधारा – गोविन्द दैवज्ञ संक्रान्ति-प्रकरण का अन्तिम क्षय मास विचार, निर्णयसागर संस्करण पृष्ठ 155 तिथ्यर्धे प्रथमे...: पहले तिथि-अर्ध में पहला मास, दूसरे तिथि-अर्ध में दूसरा मास।
श्राद्ध चन्द्रिका – दिवाकर भट्ट प्रत्याब्दिक-श्राद्ध विचार, चौखम्बा संस्करण पृष्ठ 86; वहां सत्यव्रत-वचन के रूप में उद्धृत दो संक्रान्तियों वाले एक मास में दोनों मासों से सम्बन्धित श्राद्ध करने की अनुमति।
धर्मसिन्धु – काशीनाथ उपाध्याय प्रथम परिच्छेद, मलमास-विचार: “क्षय मास का उदाहरण”, फिर वर्ज्यावर्ज्य-कर्म-निर्णय दो मास-नाम, आसपास के अधिक मास तथा वर्ज्य और जारी रहने वाले कर्मों का भेद।
निर्णयसिन्धु – कमलाकर भट्ट परामर्श की गई नेपाली आवृत्ति/अध्ययन, प्रस्तावना भाग §3.2 “मलमास विचार”, पृष्ठ 97–99; विशेषतः 98–99 नित्य, नैमित्तिक, मृत्यु-सम्बन्धी और समयबद्ध कर्म; गर्भाधान से अन्नप्राशन तक संस्कार; वर्ज्य वैकल्पिक कर्म।

ऑनलाइन मूल-पाठ और सहायक सन्दर्भ

सम्पादकीय टिप्पणी: अमान्त-पूर्णिमान्त पद्धति, वेद-शाखा, परिवार और क्षेत्रीय आचार के कारण व्यवहार में अन्तर हो सकता है। किसी विशेष परिवार के धर्म-निर्णय के लिए योग्य आचार्य या पुरोहित का मार्गदर्शन लें।


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