पितृस्मरण · महालय पक्ष
पितृपक्ष 2026 की तिथियाँआपके स्थान के लिए श्राद्ध तिथि और समय
पितृपक्ष हमें जन्म देने वाले माता-पिता और वंश के पूर्वजों को कृतज्ञता से स्मरण करने का समय है। इस पक्ष में श्राद्ध किस दिन और किस समय करना चाहिए, यह बात यहाँ आपको सरल ढंग से समझा रहा हूँ।
अपने नगर की तिथियाँ देखें
वर्तमान वर्षवह स्थान चुनें जहाँ श्राद्ध करेंगे। आरम्भ में हैदराबाद का विवरण दिखता है। विदेश में रहते हैं तो वहाँ का नगर चुनें।
चुना हुआ स्थान: Hyderabad, Telangana, India · Asia/Kolkata
सभी समय चुने हुए स्थान के स्थानीय समय हैं, 24 घंटे की पद्धति में। जहाँ लागू हो, डेलाइट सेविंग परिवर्तन भी शामिल हैं।
2026 की पितृपक्ष श्राद्ध तिथि सूची
अपनी तिथि की पंक्ति देखें। तिथि का आरम्भ और अन्त पूरी तारीख सहित दिया है। एक तारीख पर दो श्राद्ध तिथियाँ आ सकती हैं।
| श्राद्ध | तिथि आरम्भ → अन्त | कुतुप | रौहिण | अपराह्न |
|---|---|---|---|---|
| भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध पक्ष से पहले | 25 सितम्बर 2026 · 23:07→ 26 सितम्बर 2026 · 22:19 | 11:43–12:31 | 12:31–13:19 | 13:19–15:44 |
| प्रतिपदा श्राद्ध | 26 सितम्बर 2026 · 22:19→ 27 सितम्बर 2026 · 20:59 | 11:43–12:31 | 12:31–13:19 | 13:19–15:43 |
| द्वितीया श्राद्ध | 27 सितम्बर 2026 · 20:59→ 28 सितम्बर 2026 · 19:14 | 11:42–12:30 | 12:30–13:18 | 13:18–15:43 |
| तृतीया श्राद्ध महाभरणी श्राद्ध | 28 सितम्बर 2026 · 19:14→ 29 सितम्बर 2026 · 17:10 | 11:42–12:30 | 12:30–13:18 | 13:18–15:42 |
| चतुर्थी श्राद्ध तिथि द्वय | 29 सितम्बर 2026 · 17:10→ 30 सितम्बर 2026 · 14:55 | 11:42–12:30 | 12:30–13:18 | 13:18–15:42 |
| पंचमी श्राद्ध तिथि द्वय | 30 सितम्बर 2026 · 14:55→ 1 अक्टूबर 2026 · 12:35 | 11:42–12:30 | 12:30–13:18 | 13:18–15:42 |
| षष्ठी श्राद्ध | 1 अक्टूबर 2026 · 12:35→ 2 अक्टूबर 2026 · 10:15 | 11:41–12:29 | 12:29–13:17 | 13:17–15:41 |
| सप्तमी श्राद्ध | 2 अक्टूबर 2026 · 10:15→ 3 अक्टूबर 2026 · 08:00 | 11:41–12:29 | 12:29–13:17 | 13:17–15:40 |
| अष्टमी श्राद्ध | 3 अक्टूबर 2026 · 08:00→ 4 अक्टूबर 2026 · 05:52 | 11:41–12:29 | 12:29–13:16 | 13:16–15:40 |
| नवमी श्राद्ध | 4 अक्टूबर 2026 · 05:52→ 5 अक्टूबर 2026 · 03:54 | 11:40–12:28 | 12:28–13:16 | 13:16–15:39 |
| दशमी श्राद्ध | 5 अक्टूबर 2026 · 03:54→ 6 अक्टूबर 2026 · 02:08 | 11:40–12:28 | 12:28–13:16 | 13:16–15:39 |
| एकादशी श्राद्ध | 6 अक्टूबर 2026 · 02:08→ 7 अक्टूबर 2026 · 00:35 | 11:40–12:28 | 12:28–13:15 | 13:15–15:38 |
| द्वादशी श्राद्ध मघा श्राद्ध | 7 अक्टूबर 2026 · 00:35→ 7 अक्टूबर 2026 · 23:17 | 11:40–12:27 | 12:27–13:15 | 13:15–15:37 |
| त्रयोदशी श्राद्ध | 7 अक्टूबर 2026 · 23:17→ 8 अक्टूबर 2026 · 22:16 | 11:39–12:27 | 12:27–13:14 | 13:14–15:37 |
| चतुर्दशी श्राद्ध | 8 अक्टूबर 2026 · 22:16→ 9 अक्टूबर 2026 · 21:36 | 11:39–12:27 | 12:27–13:14 | 13:14–15:36 |
| सर्वपितृ अमावस्या | 9 अक्टूबर 2026 · 21:36→ 10 अक्टूबर 2026 · 21:20 | 11:39–12:26 | 12:26–13:14 | 13:14–15:36 |
ये उस दिन के काल-विभाग हैं। कर्म का समय चुनते हुए तिथि का आरम्भ और अन्त भी देखें। तिथि द्वय और शून्य तिथि का अर्थ नीचे समझाया है।
मुझे महालय श्राद्ध किस दिन करना चाहिए?
पूर्वजों के लिए आपको कब महालय श्राद्ध करना चाहिए, यहाँ उसकी तारीख जान सकते हैं। वार्षिक श्राद्ध के लिए मृत्यु का मास, पक्ष और तिथि आवश्यक हैं।
तिथि नहीं मालूम — केवल मृत्यु की तारीख पता है
मृत्यु की तारीख, उस समय का स्थानीय समय और स्थान भरें। मृत्यु का स्थान तथा श्राद्ध करने का स्थान अलग हो सकते हैं।
समय अज्ञात हो तो उस दिन की सभी सम्भव तिथियाँ दिखाऊँगा। एक से अधिक हों तो पारिवारिक अभिलेख या पुरोहित की सहायता से पुष्टि करें।
पितृपक्ष क्या है?
अमान्त मास-पद्धति में भाद्रपद का कृष्ण पक्ष महालय या पितृपक्ष कहलाता है। उत्तर भारत की पूर्णिमान्त पद्धति में यही समय आश्विन कृष्ण पक्ष कहलाता है। मास के नाम में अन्तर है, लेकिन संकेत एक ही पक्ष का है।
जिन माता-पिता ने हमें जन्म दिया और जिन पूर्वजों से हमारा वंश चला, उन्हें कृतज्ञता से याद करने का यह समय है। परम्परा में श्रद्धापूर्वक पितृकर्म करना दायित्व माना गया है। तर्पण, श्राद्ध, पिण्डदान और अन्नदान जैसे कर्म परिवार की परम्परा तथा कर्ता पर लागू विधि से किए जाते हैं।
श्राद्ध तिथि कैसे तय होती है?
सूर्योदय की तिथि और श्राद्ध तिथि का एक होना आवश्यक नहीं। सामान्य पंचांग में सूर्योदय की तिथि दिखती है, जबकि श्राद्ध का दिन तय करने में अपराह्न की तिथि-व्याप्ति देखनी चाहिए।
यदि तिथि दो दिनों के अपराह्न में रहे, तो मेरी साइट की गणना अधिक व्याप्ति वाले दिन को चुनती है। बराबर व्याप्ति पर पहला दिन लिया जाता है। इसलिए नगर बदलने पर कभी-कभी श्राद्ध की तारीख भी बदल सकती है। यहाँ मासिक श्राद्ध साधन के वही नियम अपनाए हैं।
तिथि द्वय का अर्थ क्या है?
दो अलग तिथियों के लिए एक ही तारीख श्राद्ध का दिन तय हो, तो इसे यहाँ तिथि द्वय कहते हैं। तिथि हमेशा 24 घंटे की नहीं होती। उसके आरम्भ, अन्त और पास के दिनों की अपराह्न व्याप्ति की जाँच से ऐसा हो सकता है।
केवल एक अपराह्न में दो तिथियाँ दिखाई देने से दोनों का श्राद्ध उसी दिन तय नहीं कर देना चाहिए। पास के दिन की व्याप्ति भी जाँची जाती है। उसके बाद दोनों तिथियों को एक तारीख मिलने पर ही सारणी में तिथि द्वय लिखा है।
इसका अर्थ एक ही व्यक्ति के लिए दो श्राद्ध करना नहीं है। अपने पितृ की मृत्यु तिथि वाली पंक्ति लें। परिवार में दो अलग श्राद्ध एक दिन करने हों तो उनका क्रम और विधि पुरोहित से पूछें।
30 सितम्बर 2026, बुधवार: कृष्ण चतुर्थी, कृष्ण पंचमी
शून्य तिथि का अर्थ क्या है?
किसी तारीख को एक भी श्राद्ध तिथि आवंटित न हो, तो यहाँ उसे शून्य तिथि या शून्य श्राद्ध दिन कहते हैं। इसका अर्थ उस दिन कोई तिथि न होना नहीं है। हर क्षण कोई न कोई तिथि रहती है; शून्य शब्द यहाँ श्राद्ध-दिन के आवंटन से सम्बन्धित है।
कोई तिथि दो दिनों के अपराह्न में हो तो उसका श्राद्ध अधिक व्याप्ति वाले दिन रखा जाता है। दूसरे दिन को पड़ोसी तिथियों का श्राद्ध भी न मिले, तो वह शून्य श्राद्ध दिन रहता है। इसीलिए पंचांग में तिथि होते हुए भी श्राद्ध सारणी में शून्य तिथि दिख सकती है।
शून्य तारीख के बदले अपनी तिथि को दिए गए दिन को देखें। यह संकेत उस दिन पितृस्मरण या दान जैसे सभी कार्यों का निषेध नहीं बताता। विशिष्ट कर्म के लिए परिवार की परम्परा मानें।
चुने हुए स्थान और वर्ष के इस महालय पक्ष में शून्य श्राद्ध दिन नहीं हैं।
अपराह्न व्याप्ति न होना और शून्य तिथि क्या एक हैं?
दोनों अलग हैं। शून्य श्राद्ध दिन में किसी दिन को श्राद्ध तिथि नहीं मिली है। अपराह्न व्याप्ति रहित तिथि किसी भी दिन के अपराह्न में नहीं आती। दूसरी स्थिति में मासिक गणना के अनुसार तिथि शुरू होने की स्थानीय तारीख देकर विशेष चिन्ह दिखाता हूँ।
ऐसी पंक्ति के समय उस दिन के काल हैं; पूरी अवधि में सम्बन्धित तिथि होने की गारंटी नहीं। कर्म का समय पुरोहित से निश्चित करें। सामान्य पंचांग में क्षय तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त होती है। इसे शून्य श्राद्ध दिन से न मिलाएँ।
कुतुप, रौहिण और अपराह्न क्या हैं?
सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिनमान के 15 बराबर भाग करें तो आठवाँ कुतुप और नौवाँ रौहिण है। दिनमान के पाँच भागों में चौथा अपराह्न है।
कुतुप दिनमान के 7/15 से 8/15, रौहिण 8/15 से 9/15 और अपराह्न 3/5 से 4/5 तक है। रौहिण के अन्त पर अपराह्न शुरू होता है। दिनमान ठीक 12 घंटे होने पर ही एक मुहूर्त 48 मिनट का होगा।
श्राद्ध आरम्भ के लिए कुतुप प्रशस्त माना गया है। उसके बाद रौहिण आदि कालों में अपराह्न समाप्त होने तक कर्म करने की परम्परा है। सम्बन्धित तिथि की व्याप्ति भी देखें। ये घड़ी के समय हर नगर में एक जैसे नहीं होते।
मृत्यु तिथि से महालय श्राद्ध कैसे देखें?
सामान्य महालय चयन में मृत्यु शुक्ल पक्ष में हुई हो या कृष्ण पक्ष में, सम्बन्धित तिथि के नाम से पितृपक्ष का श्राद्ध दिन देखा जाता है। शुक्ल अष्टमी या कृष्ण अष्टमी मृत्यु तिथि हो तो महालय अष्टमी श्राद्ध की तारीख देखें।
वार्षिक श्राद्ध और महालय श्राद्ध अलग हैं। मृत्यु के मास, पक्ष और तिथि पर होने वाले वार्षिक श्राद्ध की जगह यह पितृपक्ष सारणी नहीं लेती। उसके लिए वार्षिक श्राद्ध साधन उपयोग करें।
पहले वर्ष के कर्म, सपिण्डीकरण की स्थिति, सौभाग्यवती अवस्था में मृत्यु, संन्यासी या अस्वाभाविक मृत्यु जैसी विशेष परिस्थितियों में सामान्य तिथि चयन पर्याप्त नहीं। परिवार पर लागू विधि पुरोहित से निश्चित करें।
पूर्णिमा को मृत्यु हुई हो तो?
पितृपक्ष से पहले आने वाला भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध एक विशेष पार्वण श्राद्ध है। इसे सारणी में दिखाया है, लेकिन महालय कृष्ण पक्ष का आरम्भ नहीं माना है।
पूर्णिमा को दिवंगत हुए व्यक्ति का महालय श्राद्ध अमावस्या को करने की परम्परा इस साधन में अपनाई है। शुक्ल–पूर्णिमा चुनने पर सर्वपितृ अमावस्या का परिणाम आता है। अपनी पारिवारिक परम्परा पर सन्देह हो तो पहले पुष्टि करें।
25 सितम्बर 2026 · 23:07 → 26 सितम्बर 2026 · 22:19
कुतुप: 11:43–12:31
रौहिण: 12:31–13:19
अपराह्न: 13:19–15:44
महाभरणी श्राद्ध
महालय पक्ष में अपराह्न के समय भरणी नक्षत्र की व्याप्ति वाले दिन महाभरणी श्राद्ध का महत्त्व है। इसे हर वर्ष एक ही तिथि से नहीं जोड़ सकते। भरणी किस दिन और कितनी देर अपराह्न में है, यह देखना चाहिए।
यहाँ आपके स्थान के लिए नक्षत्र का आरम्भ, अन्त और चुनी तारीख दिखती है। विशेष श्राद्ध की विधि अपनी परम्परा के अनुसार तय करें।
नक्षत्र आरम्भ: 29 सितम्बर 2026 · 09:03
नक्षत्र अन्त: 30 सितम्बर 2026 · 07:36
अपराह्न: 13:18–15:42
मघा श्राद्ध
परम्परा में मघा नक्षत्र का सम्बन्ध पितृदेवताओं से बताया गया है। महालय पक्ष में अपराह्न में मघा की व्याप्ति वाले दिन मघा श्राद्ध होता है। दो दिनों के अपराह्न में मघा हो तो यह गणना अधिक व्याप्ति वाला दिन लेती है।
मघा नक्षत्र और त्रयोदशी तिथि अपराह्न में साथ हों, तभी मघा त्रयोदशी की विशेषता देखी जाती है। हर मघा श्राद्ध को मघा त्रयोदशी नहीं कहना चाहिए।
नक्षत्र आरम्भ: 6 अक्टूबर 2026 · 22:17
नक्षत्र अन्त: 7 अक्टूबर 2026 · 21:40
अपराह्न: 13:15–15:37
तिथि ज्ञात न हो — सर्वपितृ अमावस्या
मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या सम्बन्धित तिथि पर श्राद्ध न कर पाए हों, तो सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्त्व है। इसे महालय अमावस्या भी कहते हैं। यह परिवार के सभी पूर्वजों को स्मरण करने का दिन माना जाता है।
मृत्यु की तारीख और समय ज्ञात हों, लेकिन तिथि न मालूम हो, तो ऊपर का साधन उपयोग करें। समय अज्ञात होने से उस दिन दो तिथियाँ सम्भव हों तो अनुमान से एक न चुनें। पारिवारिक जानकारी और पुरोहित के परामर्श से पुष्टि करें।
9 अक्टूबर 2026 · 21:36 → 10 अक्टूबर 2026 · 21:20
कुतुप: 11:39–12:26
रौहिण: 12:26–13:14
अपराह्न: 13:14–15:36
पहले कौन-सी जानकारी तैयार रखें?
गोत्र, पितरों के नाम, सम्बन्ध और ज्ञात मृत्यु तिथि लिख लें। श्राद्ध वाले स्थान की तारीख तय करके पुरोहित से समय की बात करें। कुश, तिल, पिण्डदान सामग्री तथा भोजन की व्यवस्था उनके निर्देश से कर सकते हैं।
दिखावे से अधिक श्रद्धा, शुचिता और पारिवारिक आचार को महत्त्व दें। पितृकर्म के नाम पर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। पूर्वजों को कृतज्ञता से याद करके अपने लिए लागू विधि जानना और उसका पालन करना मुख्य है।
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पूर्णिमा और 15 कृष्णपक्ष तिथियों की पंक्तियाँ होती हैं। एक तारीख पर दो श्राद्ध तिथियाँ या कोई शून्य श्राद्ध दिन हो सकता है। इसलिए 16 पंक्तियों का अर्थ 16 अलग तारीखें नहीं है।
गणना का आधार
तिथि और नक्षत्र के समय OnlineJyotish के मासिक श्राद्ध साधन में प्रयुक्त Swiss Ephemeris गणना से मिलते हैं। स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त से काल-विभाग निकालकर वही अपराह्न व्याप्ति नियम अपनाया है।
यह सारणी सही तारीख और काल जानने के लिए दे रहा हूँ। कर्ता की पात्रता, विशेष कर्म और पारिवारिक परम्परा के निर्णय पुरोहित से चर्चा करके लें।
मासिक श्राद्ध तिथियाँ · वार्षिक श्राद्ध तिथि · हमारी गणना पद्धति
— संतोष कुमार शर्मा गोल्लपेल्ली

