मंगल दोष विचार और शास्त्रीय निवारण नियम
मंगल दोष और उसके अपवाद
- लग्न, चंद्रमा या शुक्र से मंगल 1, 2, 4, 7, 8 अथवा 12वें भाव में हो, तो परंपरागत रूप से मंगल दोष माना जाता है।
- मंगल अपनी राशि, उच्च राशि अथवा शास्त्रों में बताई गई विशेष अपवाद राशियों में हो, तो दोष बहुत घट जाता है या समाप्त हो जाता है।
- गुरु की दृष्टि अथवा युति मंगल दोष के अशुभ प्रभाव को निष्प्रभावी कर सकती है।
- दोनों कुंडलियों में समान बल का मंगल दोष हो, तो परंपरागत रूप से दोनों दोष एक-दूसरे को संतुलित करते हैं।
नाड़ी और भकूट के साथ मंगल दोष (जिसे मांगलिक दोष भी कहा जाता है), पारंपरिक विवाह मिलान का महत्त्वपूर्ण विषय है। मंगल उष्णता, आक्रामकता और संघर्ष का कारक है; इसलिए परिवार और विवाह से संबंधित संवेदनशील भावों में उसकी स्थिति दांपत्य मतभेद की संभावना बढ़ाने वाली मानी जाती है। किंतु शास्त्रीय ग्रंथों में अनेक ऐसी स्थितियाँ बताई गई हैं जिनमें यह दोष समाप्त या बहुत कम हो जाता है।
1. मंगल दोष की परिभाषा
lagne vyaye ca pātāle yāmye cātāṣṭame kuje ।
strīṇāṃbaṃdhu vināśaḥ syāt bhartṝṇāṃbaṃdhu nāśanam ।।
अर्थ: लग्न, चंद्रमा या शुक्र से मंगल प्रथम, द्वादश, चतुर्थ, सप्तम अथवा अष्टम भाव में हो, तो मंगल दोष माना जाता है। कुछ परंपराएँ द्वितीय भाव को भी इसमें सम्मिलित करती हैं।
2. विशेष राशियों से निवारण — मुहूर्त चिंतामणि
catuḥ saptamako bhaumo meṣa karkāṭakālau ।
yathā rāśiṃ śubhaḥ prokto kujāt doṣo na vidyate ।।
अर्थ: मंगल चतुर्थ या सप्तम भाव में हो, फिर भी यदि वह मेष या वृश्चिक अपनी राशियों में, कर्क नीच राशि में अथवा मकर उच्च राशि में स्थित हो, तो संबंधित शास्त्रीय नियम के अनुसार मंगल दोष लागू नहीं होता।
3. चर राशियों का अपवाद — जातक चंद्रिका
cara rāśi gato bhaumaḥ catur āṣṭa vyaye dvaye ।
lagna pāpa vināśasyāt cāre pāpo viśeṣataḥ ।।
अर्थ: मंगल दोष के भावों में मंगल मेष, कर्क, तुला या मकर जैसी चर राशि में हो, तो उसका अशुभ प्रभाव समाप्त या बहुत कम माना जाता है।
4. गुरु या बुध से निवारण — जातक पारिजात
sthāna paṃcako doṣāḥ kujasya guruṇāthavā ।
budhena saha saṃsthityā ddṛṣṭevā naiva saṃbhavet ।।
अर्थ: मंगल दोषकारक भाव में हो, फिर भी गुरु या बुध के साथ युति अथवा उनकी दृष्टि प्राप्त होने पर इस शास्त्रीय नियम के अनुसार मंगल दोष नष्ट हो जाता है।
5. सूर्य और चंद्र की राशियों का अपवाद
ravi iṃdū kṣetra jātānāṃ kuja doṣo na vidyate ।
sveccha mitrāla jātānāṃ tāt doṣaṃ na bhāvet kila ।।
अर्थ: सिंह लग्न, जो सूर्य की राशि है, अथवा कर्क लग्न, जो चंद्र की राशि है, में जन्मे जातकों और मंगल के मित्र राशि में स्थित होने पर मंगल दोष को उसी प्रकार लागू नहीं माना जाता।
6. दोनों कुंडलियों में समान दोष
vadhū varayoḥ jātake tulye kuja doṣe sati ।
doṣo doṣeṇa saṃyuktaḥ dāṃpatya sukha vardhakaḥ ।।
अर्थ: वर और वधू दोनों की कुंडलियों में समान बल का मंगल दोष हो, तो दोनों दोष एक-दूसरे को संतुलित करते हुए दांपत्य सुख पर पड़ने वाले अशुभ प्रभाव को घटाते हैं।
7. मंगल दोष परिहार और "दोष साम्य" का महान नियम
बृहत् जातक और मुहूर्त मार्तंड जैसे ग्रंथों के अनुसार, जन्म कुंडली में मंगल दोष होने पर भी कुछ विशेष ग्रह स्थितियों में यह दोष पूर्णतः शांत हो जाता है।
नीच राशि में मंगल द्वारा दोष परिहार (गर्ग ऋषि का कथन)
नीचो वा उच्चगतो वा अपि कुजदोषो न विद्यते ।
न मंगली चन्द्र द्वितीये च राशौ, न मंगली कर्कट अष्टमे च ।।
अन्वय: कर्क राशि मंगल की नीच राशि है। जब मंगल कर्क राशि में होता है, तो वह कमजोर हो जाता है, जिससे वैवाहिक जीवन के प्रति उसकी विनाशकारी या तामसिक ऊर्जा पूरी तरह से शांत हो जाती है। अतः शास्त्रानुसार यदि मंगल कर्क राशि में हो तो मंगल दोष का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।
"दोष साम्य" (समान दोष) का सिद्धांत
द्वयोः साम्यं विवाहे स्यात् शुभं भवति निश्चितम् ।।
अन्वय: शास्त्रों के अनुसार, यदि वर और वधू दोनों की कुंडली में एक ही समान ग्रह दोष हो (जैसे दोनों का मंगल कर्क राशि में हो), तो वे दोष एक-दूसरे को संतुलित (Neutralize) कर देते हैं। जब दोनों कुंडलियों में ग्रहों का स्वभाव समान होता है, तो वे एक-दूसरे के नकारात्मक प्रभावों को नष्ट कर देते हैं, जिससे वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित होता है।
8. देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि - अमृत के समान रक्षा कवच
कुंडली मिलान में सबसे सुंदर और शुभ बात देवगुरु बृहस्पति का रक्षा कवच है।
किं कुर्वन्ति ग्रहाः सर्वे यस्य केन्द्रे गुरु स्थितः ।।
गुरु दृष्टि कुजो दोषो नश्यति सर्वथा ।।
अन्वय: देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि को शुद्ध अमृत माना गया है। मंगल चाहे कितने भी क्रूर भाव में क्यों न बैठा हो, यदि उस पर बृहस्पति की शुभ दृष्टि पड़ जाए, तो उसका अशुभ प्रभाव पूरी तरह से नष्ट हो जाता है और वह शुभ फल देने लगता है। वधू की कुंडली में यदि गुरु सप्तम भाव (केंद्र) में हो, तो यह अखंड सौभाग्य और उत्तम संतान की गारंटी देता है। वहीं, वर की कुंडली में अष्टम भाव पर गुरु की दृष्टि उसे दीर्घायु प्रदान करती है।
विषय-सूची
- 1. आश्लेषा आदि नक्षत्र दोष निवारण
- 2. विवाह मिलान में अष्टकूट — परिचय
- 3. 1. वर्ण कूट विचार
- 4. 2. वश्य कूट विचार
- 5. 3. तारा कूट विचार
- 6. 4. योनि कूट विचार
- 7. 5. ग्रह मैत्री कूट विचार
- 8. 6. गण कूट विचार
- 9. 7. भकूट विचार और दोष निवारण
- 10. 8. नाड़ी कूट विचार और दोष निवारण
- 11. वर्ग कूट और अन्य मिलान विचार
- 12. मंगल दोष विचार और शास्त्रीय निवारण नियम


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