सभी 4 क्रमांकित श्लोक।
यह चार श्लोकों वाला छोटा पाठ “शुक्रः काव्यः” से शुरू होता है। शुक्र स्तोत्र नाम से दूसरे पाठ भी मिलते हैं; शुरुआती शब्द इस संस्करण की पहचान हैं।
देवनागरी में पाठ
शुक्रः काव्यः शुक्ररेता शुक्लाम्बरधरः सुधीः ।
हिमाभः कुन्दधवलः शुभ्रांशुः शुक्लभूषणः ॥ 1 ॥
नीतिज्ञो नीतिकृन्नीतिमार्गगामी ग्रहाधिपः ।
उशना वेदवेदाङ्गपारगः कविरात्मवित् ॥ 2 ॥
भार्गवः करुणासिन्धुर्ज्ञानगम्यः सुतप्रदः ।
शुक्रस्यैतानि नामानि शुक्रं स्मृत्वा तु यः पठेत् ॥ 3 ॥
आयुर्धनं सुखं पुत्रं लक्ष्मींवसतिमुत्तमाम् ।
विद्यां चैव स्वयं तस्मै शुक्रस्तुष्टोददाति च ॥ 4 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
आरंभ में उज्ज्वल रूप, श्वेत वस्त्र, ज्ञान और नीति का वर्णन है। उशना शुक्र का एक नाम है और कवि यहाँ द्रष्टा या ज्ञानी का सम्मानसूचक संबोधन है। अंत में विद्या तथा सुख की कामना है।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।