सभी 9 क्रमांकित श्लोक।
ध्यान श्लोक में उपास्य देवता का रूप मन में धारण किया जाता है। यहाँ नौ ग्रहों के रंग, आभूषण, वाहन और हाथों में धारण की गई वस्तुओं का वर्णन है।
देवनागरी में पाठ
सूर्य
प्रत्यक्षदेवं विशदं सहस्रमरीचिभिः शोभितभूमिदेशम् ।
सप्ताश्वगं सद्ध्वजहस्तमाद्यं देवं भजेऽहं मिहिरं हृदब्जे ॥ 1 ॥
चंद्र
शङ्खप्रभमेणप्रियं शशाङ्कमीशानमौलिस्थितमीड्यवृत्तम् ।
तमीपतिं नीरजयुग्महस्तं ध्याये हृदब्जे शशिनं ग्रहेशम् ॥ 2 ॥
मंगल
प्रतप्तगाङ्गेयनिभं ग्रहेशं सिंहासनस्थं कमलासिहस्तम् ।
सुरासुरैः पूजितपादपद्मं भौमं दयालुं हृदये स्मरामि ॥ 3 ॥
बुध
सोमात्मजं हंसगतं द्विबाहुं शङ्खेन्दुरूपं ह्यसिपाशहस्तम् ।
दयानिधिं भूषणभूषिताङ्गं बुधं स्मरे मानसपङ्कजेऽहम् ॥ 4 ॥
गुरु
तेजोमयं शक्तित्रिशूलहस्तं सुरेन्द्रज्येष्ठैः स्तुतपादपद्मम् ।
मेधानिधिं हस्तिगतं द्विबाहुं गुरुं स्मरे मानसपङ्कजेऽहम् ॥ 5 ॥
शुक्र
सन्तप्तकाञ्चननिभं द्विभुजं दयालुं
पीताम्बरं धृतसरोरुहद्वन्द्वशूलम् ।
क्रौञ्चासनं ह्यसुरसेवितपादपद्मं
शुक्रं स्मरे द्विनयनं हृदि पङ्कजेऽहम् ॥ 6 ॥
शनि
नीलाञ्जनाभं मिहिरेष्टपुत्रं ग्रहेश्वरं पाशभुजङ्गपाणिम् ।
सुरासुराणां भयदं द्विबाहुं शनिं स्मरे मानसपङ्कजेऽहम् ॥ 7 ॥
राहु
शीतांशुमित्रान्तकमीड्यरूपं घोरं च वैडुर्यनिभं विबाहुम् ।
त्रैलोक्यरक्षाप्रदंमिष्टदं च राहुं ग्रहेन्द्रं हृदये स्मरामि ॥ 8 ॥
केतु
लाङ्गुलयुक्तं भयदं जनानां कृष्णाम्बुभृत्सन्निभमेकवीरम् ।
कृष्णाम्बरं शक्तित्रिशूलहस्तं केतुं भजे मानसपङ्कजेऽहम् ॥ 9 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
ये वर्णन पूजा की प्रतिमाओं और ध्यान की परंपरा से जुड़े हैं। इन्हें आकाश में ग्रहों के भौतिक रूप का वर्णन न समझें। यह संग्रह “जपाकुसुमसंकाशं” से शुरू होने वाले नवग्रह स्तोत्र से अलग है।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।