सभी 7 क्रमांकित श्लोक।
बृहस्पति को गुरु और देवताओं का आचार्य कहा जाता है। कवच के आरंभ में शांत स्वरूप और अक्षरमाला धारण किए गुरु का ध्यान है।
देवनागरी में पाठ
अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् ।
अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ 1 ॥
बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः ।
कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ 2 ॥
जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः ।
मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ 3 ॥
भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः ।
स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ 4 ॥
नाभिं देवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः ।
कटिं पातु जगद्वन्द्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ 5 ॥
जानुजङ्घे सुराचार्यो पादौ विश्वात्मकस्तथा ।
अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ 6 ॥
इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ 7 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
सुराचार्य नाम देवताओं के शिक्षक और वागीश नाम वाणी के स्वामी का भाव देता है। पाठ में ज्ञान तथा मार्गदर्शन से जुड़े नामों के साथ रक्षा की प्रार्थना की गई है।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।