45 श्लोकों का पाठ।
इस सूर्य कवच की शुरुआत भैरव के कथन से होती है। “वज्रपंजर” मजबूत आवरण की उपमा है। पाठ में सूर्य के नाम, बीजाक्षर, अंगों और दिशाओं की रक्षा की प्रार्थना मिलती है।
देवनागरी में पाठ
यो देवदेवो भगवान् भास्करो महसां निधिः।
गायत्रीनायकः भास्वान् सविता इति प्रगीयते ॥ 1 ॥
तस्याहं कवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम्।
सर्वमन्त्रमयं गुह्यं मूलविद्यारहस्यकम् ॥ 2 ॥
सर्वपापापहं देवि दुःखदारिद्र्यनाशनम्।
महाकुष्ठहरं पुण्यं सर्वरोगनिवारणम् ॥ 3 ॥
सर्वशत्रुसमूहघ्नं संग्रामे विजयप्रदम्।
सर्वतेजोमयं सर्वदेवदानवपूजितम् ॥ 4 ॥
रणे राजभये घोरे सर्वोपद्रवनाशनम्।
मातृकावेष्टितं वर्म भैरवानननिर्गतम् ॥ 5 ॥
ग्रहपीडाहरं देवि सर्वसंकटनाशनम्।
धारणादस्य देवेशि ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ 6 ॥
विष्णुर्नारायणो देवि रणे दैत्याञ्जिष्यति।
शंकरः सर्वलोकेशो वासवोऽपि दिवस्पतिः ॥ 7 ॥
ओषधीशः शशी देवि शिवोऽहं भैरवेश्वरः।
मन्त्रात्मकं परं वर्म सवितुः सारमुत्तमम् ॥ 8 ॥
यो धारयेद् भुजे मूर्ध्नि रविवारे महेश्वरि।
स राजवल्लभो लोके तेजस्वी वैरिमर्दनः ॥ 9 ॥
बहुनोक्तेन किं देवि कवचस्यास्य धारणात्।
इह लक्ष्मीधनारोग्य-वृद्धिर्भवति नान्यथा ॥ 10 ॥
परत्र परमां मुक्तिर्देवानामपि दुर्लभा।
कवचस्यास्य देवेशि मूलविद्यामयस्तु च ॥ 11 ॥
वज्रपञ्जरकाख्यस्य मुनिर्ब्रह्मा समीरितः।
गायत्र्यं छन्द इत्युक्तं देवता सविता स्मृतः ॥ 12 ॥
माया बीजं शरच्च शक्तिर्नमः कीलकमीश्वरी।
सर्वार्थसाधने देवि विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ 13 ॥
ॐ अं आं इं ईं शिरः पातु ॐ सूर्यः मन्त्रविग्रहः।
उं ऊं ऋं ॠं ललाटं मे ह्रां रविः पातु चिन्मयः ॥ 14 ॥
ळुं ळूं ऐं ऐं पातु नेत्रे ह्रीं ममारुणसारथिः।
ॐ औं अं अः श्रुती पातु सः सर्वजगदीश्वरः ॥ 15 ॥
कं खं गं घं पातु गण्डौ सूं सूर्यः सुरपूजितः।
चं छं जं झं च नासां मे पातु यार्म् अर्च्यमा प्रभुः ॥ 16 ॥
टं ठं डं ढं मुखं पायाद् यं योगीश्वरपूजितः।
तं थं दं धं गलं पातु नं नारायणवल्लभः ॥ 17 ॥
पं फं बं भं मम स्कन्धौ पातु मं महसां निधिः।
यं रं लं वं भुजौ पातु मूलं सकनायकः ॥ 18 ॥
शं षं सं हं पातु वक्षः मूलमन्त्रमयो ध्रुवः।
ळं क्षः कुक्षिं सदा पातु ग्रहाथो दिनेश्वरः ॥ 19 ॥
ङं ञं णं नं मं मे पातु पृष्ठं दिवसनायकः।
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं नाभिं पातु तमोपहः ॥ 20 ॥
ळुं ळूं ऐं ऐं ॐ औं अं अः लिंगं मेऽव्याद् ग्रहेश्वरः।
कं खं गं घं चं छं जं झं कटिं भानुर्ममावतु ॥ 21 ॥
टं ठं डं ढं तं थं दं धं जानुं भास्वान् ममावतु।
पं फं बं भं यं रं लं वं जंघे मेऽव्याद् विभाकरः ॥ 22 ॥
शं षं सं हं ळं क्षः पातु मूलं पादौ त्रयितनुः।
ङं ञं णं नं मं मे पातु सविता सकलं वपुः ॥ 23 ॥
सोमः पूर्वे च मां पातु भौमोग्नौ मां सदावतु।
बुधो मां दक्षिणे पातु नैऋत्यां गुररेव माम् ॥ 24 ॥
पश्चिमे मां सितः पातु वायव्यां मां शनैश्चरः।
उत्तरे मां तमः पायादैशान्यां मां शिखी तथा ॥ 25 ॥
ऊर्ध्वं मां पातु मिहिरो मामधस्तां जगत्पतिः।
प्रभाते भास्करः पातु मध्याह्ने मां दिनेश्वरः ॥ 26 ॥
सायं वेदप्रियः पातु निशीथे विस्फुरापतिः।
सर्वत्र सर्वदा सूर्यः पातु मां चक्रनायकः ॥ 27 ॥
रणे राजकुले द्यूते विवादे शत्रुसंकटे।
संगामे च ज्वरे रोगे पातु मां सविता प्रभुः ॥ 28 ॥
ॐ ॐ ॐ उत ॐउऔम् ह स म यः सूरोऽवतन्मां भयात्।
ह्रां ह्रीं ह्रुं हहहा हसौः हसहसौः हंसोऽवतात् सर्वतः।
सः सः सः सससा नृपाद्वनचराच्चौराद्रणात् संकटात्।
पायान्मां कुलनायकोऽपि सविता ॐ ह्रीं ह सौं सर्वदा ॥ 29 ॥
द्रां द्रीं द्रूं दधनं तथा च तरणिर्भाम्भैर्भयात् भास्करो।
रां रीं रूं रुरुरूं रविर्ज्वरभयात् कुष्ठाच्च शूलामयात्।
अं अं आं विविवीं महामयभयं मां पातु मार्तंडको।
मूलव्याप्ततनुः सदावतु परं हंसः सहस्रांशुमान् ॥ 30 ॥
इति श्रीकवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम्।
सर्वदेवरहस्यम् च मातृकामन्त्रवेष्टितम् ॥ 31 ॥
महारोगभयघ्नं च पापघ्नं मन्मुखोदितम्।
गुह्यं यशस्करं पुण्यं सर्वश्रेयोस्करं शिवे ॥ 32 ॥
लिखित्वा रविवारे तु तिष्ये वा जन्मभे प्रिये।
अष्टगन्धेन दिव्येन सुधाक्षीरेण पार्वति ॥ 33 ॥
अर्कक्षीरेण पुण्येन भुर्जत्वचि महेश्वरी।
कनकीकाष्ठलेखन्या कवचं भास्करोदयम् ॥ 34 ॥
श्वेतसूत्रेण रक्तेन श्यामेनावेष्टयेद् गुटीं।
सुवर्णेनाथ संवेष्ट्य धारयेन् मूर्ध्नि वा भुजे ॥ 35 ॥
रणे रिपूञ्जयेद् देवि वादे सदसि जेष्यति।
राजमान्यो भवेन्नित्यं सर्वतेजोमयो भवेत् ॥ 36 ॥
कण्ठस्था पुत्रदा देवि कुक्षिस्था रोगनाशिनी।
शिरःस्था गुटिका दिव्या राकालोकवशंकरि ॥ 37 ॥
भुजस्था धनदा नित्यं तेजोबुद्धिविवर्धिनी।
वंध्या वा काकवंध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना ॥ 38 ॥
कण्ठे सा धारयेनित्यं बहुपुत्रा प्रजायये।
यस्य देहे भवेन्नित्यं गुटिकैषा महेश्वरी ॥ 39 ॥
महास्त्राणीन्द्रमुक्तानि ब्रह्मास्त्रादीनि पार्वति।
तद्देहं प्राप्य व्यर्थानि भविष्यन्ति न संशयः ॥ 40 ॥
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं कवचं वज्रपञ्जरम्।
तस्य सद्यो महादेवी सविता वरदो भवेत् ॥ 41 ॥
अज्ञात्वा कवचं देवि पूजयेद्यस्त्रयीतनुम्।
तस्य पूजार्जितं पुण्यं जन्मकोटिषु निष्फलम् ॥ 42 ॥
शतावर्तन पठेद्वर्म सप्तम्यां रविवासरे।
महाकुष्ठार्दितो देवि मुच्यते नात्र संशयः ॥ 43 ॥
निरोगो यः पठेद्वर्म दरिद्रो वज्रपञ्जरम्।
लक्ष्मीवान्जायते देवि सद्यः सूर्यप्रसादतः ॥ 44 ॥
भक्त्या यः प्रपठेद् देवि कवचं प्रत्यहं प्रिये।
इह लोके श्रियं भुक्त्वा देहान्ते मुक्तिमाप्नुयात् ॥ 45 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
यहाँ पहले से उपलब्ध 45 श्लोक रखे गए हैं। बाद के अंशों में धारणा की पारंपरिक विधि और फलश्रुति आती है। ये धार्मिक पाठ के हिस्से हैं; बीमारी या शारीरिक सुरक्षा के लिए इनके वर्णन को उपचार की विधि न मानें।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।