सभी 6 क्रमांकित श्लोक।
इस स्तोत्र में चंद्रमा के अट्ठाईस नाम श्लोकों में पिरोए गए हैं। नामों से चंद्रमा की शीतलता, प्रकाश और पौराणिक संदर्भ समझने में मदद मिलती है।
देवनागरी में पाठ
चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते ।
यानि श्रुत्वा नरो दुःखान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ 1 ॥
सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरब्जः कुमुदप्रियः ।
लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥ 2 ॥
शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः ।
आत्रेय इन्दुः शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥ 3 ॥
जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णवसम्भवः ।
नक्षत्रनायकः शम्भुशिरश्चूडामणिर्विभुः ॥ 4 ॥
तापहर्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् ।
प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥ 5 ॥
तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत्सर्वं समीहितम् ।
ग्रहादीनां च सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥ 6 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
शीतांशु का अर्थ शीतल किरणों वाला और नभोदीप का भाव आकाश का दीपक है। रोहिणीपति नाम चंद्रमा और रोहिणी के संबंध को याद दिलाता है। समापन में उपासक के कल्याण की कामना है।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।