सभी 26 क्रमांकित श्लोक।
यह लंबा शनि स्तोत्र नारद के वर्णन से शुरू होता है, जिसमें राजा युधिष्ठिर शनि की स्तुति करते हैं। इसमें रक्षा, नामों की स्तुति और अंत की कथा मिलती है।
देवनागरी में पाठ
ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम् ॥ 1 ॥
शिरो मे भास्करिः पातु भालं छायासुतोऽवतु ।
कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती ॥ 2 ॥
घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोऽवतु ।
स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोऽवतु ॥ 3 ॥
सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोऽवतु ।
ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ॥ 4 ॥
पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः ।
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम् ॥ 5 ॥
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः ।
सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शनिः ॥ 6 ॥
शुष्कोदरो विशालाक्षो दुर्निरीक्ष्यो विभीषणः ।
शिखिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः ॥ 7 ॥
कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः ।
दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः ॥ 8 ॥
नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुर्जटाधरः ।
मन्दो मन्दगतिः खंजो तृप्तः संवर्तको यमः ॥ 9 ॥
ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी ।
कुजो बुधो गुरुः काव्यो भानुजः सिंहिकासुतः ॥ 10 ॥
केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैरृतस्तथा ।
शशी मरुत्कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः ॥ 11 ॥
विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः ।
कर्ता हर्ता पालयिता राज्यभुग् राज्यदायकः ॥ 12 ॥
छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः ।
क्रूरकर्मविधाता च सर्वकर्मावरोधकः ॥ 13 ॥
तुष्टो रुष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः ।
ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः ॥ 14 ॥
स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः ।
महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः ॥ 15 ॥
आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनन्दनः ।
शतभिरुक्षदयिता त्रयोदशीतिथिप्रियः ॥ 16 ॥
तिथ्यात्मा तिथिगणनो नक्षत्रगणनायकः ।
योगराशिर्मुहूर्तात्मा कर्ता दिनपतिः प्रभुः ॥ 17 ॥
शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः ।
नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः ॥ 18 ॥
सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः ।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः ॥ 19 ॥
पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम् ।
कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान्यः स्तवं सदा ॥ 20 ॥
विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति ।
जन्मलग्ने स्थितिर्वापि गोचरे क्रूरराशिगे ॥ 21 ॥
दशासु च गते सौरौ तदा स्तवमिमं पठेत् ।
पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः ॥ 22 ॥
विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते ।
बाधा याऽन्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति ॥ 23 ॥
भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् ॥ 24 ॥
पुत्रवान्धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः ॥ 25 ॥
नारद उवाच ॥
स्तवं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोऽभूत् शनैश्चरः ।
दत्त्वा राज्ञे वरः कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा ॥ 26 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
शनैश्चर का भाव धीरे चलने वाला है। छायासुत छाया के पुत्र को कहते हैं। अलग अंशों में शनि के रंग, समय और दिव्य रूपों का वर्णन है। यहाँ सभी 26 क्रमांकित श्लोक दिए गए हैं।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।