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शनि पीड़ाहर स्तोत्र हिंदी में – Shani Peedahar Stotra | शनि दोष निवारण


Shani Peedahar Stotra

यहाँ दिया गया "शनि पीड़ाहर स्तोत्र" ब्रह्मांड पुराण का एक प्रमुख एवं शक्तिशाली स्तोत्र है। यह शनि देव के अशुभ प्रभाव, साढ़ेसाती, अष्टम शनि या जन्मपत्रिका में शनि की स्थिति से उत्पन्न समस्याओं, अड़चनों, विलंब, रोग और अन्य परेशानियों से राहत पाने हेतु अत्यंत लाभकारी माना गया है। इस स्तोत्र की रचना स्वयं दशरथ महाराज ने की थी।
इस स्तोत्र में शनिदेव को अनेक नामों—"कोण", "अन्तक", "रौद्र", "यम", "सौरि", "शनैश्चर" आदि—से स्तुत किया गया है। ये सभी नाम शनि की शक्ति, कृपा और विशेषताओं का वर्णन करते हैं।
स्तोत्र में यह भी बताया गया है कि देवता, असुर, मनुष्य, पशु-पक्षी, सब पर शनि का प्रभाव पड़ता है; लेकिन भक्ति भाव से शनि की उपासना करने पर उनका आशीर्वाद अवश्य मिलता है।
इस स्तोत्र के नित्य पाठ से आयु, स्वास्थ्य, संपत्ति और सुख में वृद्धि होती है। विशेषकर शनिवार को या शनि ग्रह के पीड़ित रहने पर इसका पाठ शुभ फल देता है।

श्रीगणेशाय नमः॥
इस श्रीशनैश्चर स्तोत्र के ऋषि दशरथ हैं।
देवता – शनैश्चर, छंद – त्रिष्टुप्।
जप के उपयोग हेतु – शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए।
दशरथ उवाच:
कोणोऽन्तकः रौद्रयमः अथ बभ्रुः कृष्णः शनि: पिङ्गलमन्दसौरिः।
नित्यं स्मृतो यो हरते च पीड़ां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 1 ॥
सुरासुराः किम्पुरुषोरगेन्द्रा गंधर्वविद्याधरपन्नगाश्च।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 2 ॥
नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृंगाः।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 3 ॥
देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 4 ॥
तिलैः यवैः माषगुडान्नदानैः लोहेन नीलाम्बरदानतो वा।
प्रीणाति मन्त्रैः निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 5 ॥
प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुफायाम्।
यो योगिनां ध्यानगतोऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 6 ॥
अन्यप्रदेशात् स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यात्।
गृहाद् गतः यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 7 ॥
स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी।
एकस्त्रिधा ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥ 8 ॥
शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च।
पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते॥ 9 ॥
कोणस्थः पिंगलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः॥ 10 ॥
एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।
शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति॥ 11 ॥

|| इति श्री ब्रह्माण्डपुराणे श्रीशनैश्चर स्तोत्र सम्पूर्णम् ||

शनि की साढ़ेसाती, अष्टम शनि, शनि दोष, अड़चन, विलंब या स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित जातकों के लिए यह स्तोत्र अति फलदायक है। शनिदेव की कृपा पाने हेतु इसका पाठ अवश्य करें।

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नोट: इस वेबसाइट पर त्योहारों और ग्रहण की तिथियों की गणना स्विस एफेमेरिस (Swiss Ephemeris) और दृक सिद्धांत के आधार पर की गई है। यहां दर्शाए गए समय आपके चुने गए शहर के अक्षांश और देशांतर के अनुसार समायोजित किए गए हैं, जिसमें सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त की गणना टोपोसेंट्रिक (topocentric) निर्देशांकों का उपयोग करके की गई है। क्षेत्रीय परंपराओं या स्थानीय पंचांग की भिन्नताओं के कारण इसमें मामूली अंतर आ सकता है। किसी भी संदेह की स्थिति में, कृपया अपने स्थानीय पंचांग या पारिवारिक पुरोहित (पंडित जी) से पुष्टि अवश्य कर लें।