सभी 6 क्रमांकित श्लोक।
राहु के पच्चीस नामों में उनके रूप, शक्ति और सूर्य-चंद्र से जुड़े पौराणिक प्रसंग आते हैं। अंत में भक्त के कल्याण की कामना की गई है।
देवनागरी में पाठ
राहुर्दानवमन्त्री च सिंहिकाचित्तवन्दनः ।
अर्धकायः सदाक्रोधी चन्द्रादित्यविमर्दनः ॥ 1 ॥
रौद्रो रुद्रप्रियो दैत्यः स्वर्भानुर्भानुभीतिदः ।
ग्रहराजः सुधापायी राकातिथ्यभिलाषुकः ॥ 2 ॥
कालदृष्टिः कालरूपः श्रीकण्ठहृदयाश्रयः ।
विधुन्तुदः सैंहिकेयो घोररूपो महाबलः ॥ 3 ॥
ग्रहपीडाकरो दंष्ट्री रक्तनेत्रो महोदरः ।
पञ्चविंशतिनामानि स्मृत्वा राहुं सदा नरः ॥ 4 ॥
यः पठेन्महती पीडा तस्य नश्यति केवलम् ।
आरोग्यं पुत्रमतुलां श्रियं धान्यं पशूंस्तथा ॥ 5 ॥
ददाति राहुस्तस्मै यः पठते स्तोत्रमुत्तमम् ।
सततं पठते यस्तु जीवेद्वर्षशतं नरः ॥ 6 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
स्वर्भानु ग्रहण-कथा से जुड़ा एक नाम है। अर्धकाय आधे शरीर के चित्रण की ओर संकेत करता है। पौराणिक रूपक और ग्रहण की खगोलीय गणना को अलग समझना उपयोगी है।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।