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नवग्रह करावलंब स्तोत्र: हिंदी भावार्थ

दस अंशों का हिंदी भावार्थ।

करावलंब का अर्थ है हाथ का सहारा। इस पृष्ठ पर पहले से उपलब्ध हिंदी भावार्थ दिया गया है, जिसमें हर ग्रह से सहारा देने की प्रार्थना की गई है।

हिंदी भावार्थ

सूर्य

ज्योतीश देव, तीनों लोकों की मूलशक्ति,
गौ, नाथ, देवताओं द्वारा पूजित, तेजस्वी,
वीर्य और वरदाता, आदिदेव,
आदित्य! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 1 ॥

चंद्र

नक्षत्रों के नाथ, शीतल प्रकाश वाले,
श्री लक्ष्मी के प्रिय सहोदर, उज्जवल स्वरूप,
क्षीर सागर से उत्पन्न, रात्रि के सुंदर कारक,
शशांक! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 2 ॥

मंगल

रूद्रपुत्र, बुद्धि से पूजित, रौद्र स्वरूप,
धर्मयुक्त, मंगलदायक, धरती के पुत्र,
रोग दूर करने वाले, ऋणमोचक, बुद्धिदायक,
भूमिपुत्र! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 3 ॥

बुध

चंद्रपुत्र, देवताओं द्वारा पूजित, सौम्य स्वरूप,
नारायण प्रिय, मनोहर और दिव्य कीर्ति वाले,
ज्ञान और वाणी के स्वामी, विद्वानों में श्रेष्ठ,
बुधदेव! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 4 ॥

गुरु (बृहस्पति)

वेदों के ज्ञाता, आत्मा को प्रकाशित करने वाले,
ब्रह्मा आदि द्वारा पूजित, योगीश्वरों के गुरु,
संपूर्ण गुणों से भरे, जगत के जनक,
वागीश! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 5 ॥

शुक्र

सृजन और आनंद के दाता, भृगु वंशज,
लक्ष्मी के भाई, कला के स्वामी, भाग्यवर्द्धक,
इच्छाओं के दाता, दैत्यों के गुरु, शीलवान,
शुक्रदेव! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 6 ॥

शनि

शुद्धात्मा, ज्ञान से दीप्त, कालस्वरूप,
छाया का पुत्र, यम के अग्रज, गंभीर,
दुःख और कष्ट देने वाले, मंदगामी,
मार्तंडपुत्र! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 7 ॥

राहु

मार्तंड (सूर्य) और चंद्र को ग्रसने वाले,
सर्पों के नाथ, दैत्यों में उत्पन्न,
गोमेद से सुशोभित, भक्तिदाता,
राहु देव! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 8 ॥

केतु

आदित्य-चंद्र को कष्ट देने वाले, विचित्र वर्ण वाले,
सिंहिका के वीर पुत्र, नागों के स्वामी,
शनि के प्रिय सखा, मोक्षदाता,
केतु देव! मुझे अपना सहारा दो। ॥ 9 ॥

फलश्रुति

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति,
शुक्र, शनि, राहु और केतु की
करावलंब स्तुति जो श्रद्धा से पढ़ता है,
उसके सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। ॥ 10 ॥

पाठ का प्रसंग और भाव

यह हिंदी भावार्थ है, संस्कृत मूल पाठ नहीं। संदर्भ संस्करण में रचना का श्रेय पी. वी. आर. नरसिंह राव को दिया गया है; इसलिए इसे सीधे वेदों से लिया गया प्राचीन मंत्र नहीं कहा गया है। संस्कृत पाठ के लिए नीचे दिया संदर्भ खोलें।

स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।

पढ़ने की विधि

पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।

उच्चारण और पाठांतर

संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।

क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?

परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।

संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं। ऊपर इस वेबसाइट का पहले से उपलब्ध हिंदी भावार्थ रखा गया है।

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नोट: इस वेबसाइट पर त्योहारों और ग्रहण की तिथियों की गणना स्विस एफेमेरिस (Swiss Ephemeris) और दृक सिद्धांत के आधार पर की गई है। यहां दर्शाए गए समय आपके चुने गए शहर के अक्षांश और देशांतर के अनुसार समायोजित किए गए हैं, जिसमें सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त की गणना टोपोसेंट्रिक (topocentric) निर्देशांकों का उपयोग करके की गई है। क्षेत्रीय परंपराओं या स्थानीय पंचांग की भिन्नताओं के कारण इसमें मामूली अंतर आ सकता है। किसी भी संदेह की स्थिति में, कृपया अपने स्थानीय पंचांग या पारिवारिक पुरोहित (पंडित जी) से पुष्टि अवश्य कर लें।