राहु ज्योतिष में चंद्रपथ का आरोही पात है, कोई ठोस ग्रह नहीं। धार्मिक कथाओं में राहु का रूप ग्रहणों से जुड़ा है। इस कवच में ध्यान और रक्षा की प्रार्थना है।
कटिं मे विकटः पातु ऊरू मे सुरपूजितः ।
स्वर्भानुर्जानुनी पातु जङ्घे मे पातु जाड्यहा ॥ 5 ॥
गुल्फौ ग्रहपतिः पातु पादौ मे भीषणाकृतिः ।
सर्वाण्यङ्गानि मे पातु नीलचन्दनभूषणः ॥ 6 ॥
राहोरिदं कवचमृद्धिदवस्तुदं यो
भक्त्या पठत्यनुदिनं नियतः शुचिः सन् ।
प्राप्नोति कीर्तिमतुलां श्रियमृद्धिमायु
रारोग्यमात्मविजयं च हि तत्प्रसादात् ॥ 7 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
सैंहिकेय नाम सिंहिका के पुत्र का संकेत देता है। करालास्य का अर्थ उग्र मुख वाला है। यह प्रतिमा-वर्णन और उपासना की भाषा है; इसे पाठक के जीवन में किसी खतरे का प्रमाण न मानें।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।