ऊरू तारापतिः पातु मृगाङ्को जानुनी सदा ।
अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥ 6 ॥
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्रोऽखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ 7 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
चंद्रमा का चित्रण शीतलता, रात और शिव के मस्तक के चंद्र से जुड़ता है। “पातु” का अर्थ है “रक्षा करें”। यहाँ सभी सात क्रमांकित श्लोक दिए गए हैं।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।