सभी 5 क्रमांकित श्लोक।
इस नाम-स्तुति में केतु को धूम्रकेतु, महाकेतु और अन्य नामों से संबोधित किया जाता है। पाँच श्लोकों में नाम तथा पाठ की महिमा आती है।
देवनागरी में पाठ
केतुः कालः कलयिता धूम्रकेतुर्विवर्णकः ।
लोककेतुर्महाकेतुः सर्वकेतुर्भयप्रदः ॥ 1 ॥
रौद्रो रुद्रप्रियो रुद्रः क्रूरकर्मा सुगन्धधृक् ।
पलाशधूमसंकाशश्चित्रयज्ञोपवीतधृक् ॥ 2 ॥
तारागणविमर्दी च जैमिनेयो ग्रहाधिपः ।
गणेशदेवो विघ्नेशो विषरोगार्तिनाशनः ॥ 3 ॥
प्रव्रज्यादो ज्ञानदश्च तीर्थयात्राप्रवर्तकः ।
पञ्चविंशतिनामानि केतोर्यः सततं पठेत् ॥ 4 ॥
तस्य नश्यति बाधा च सर्वकेतुप्रसादतः ।
धनधान्यपशूनां च भवेद् वृद्धिर्न संशयः ॥ 5 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
धूम्र का अर्थ धुएँ जैसा और केतु का एक अर्थ ध्वजा है। इन रूपकों के बाद भक्त की कामनाएँ कही गई हैं। यह प्रार्थना का पाठ है, चंद्रपात के किसी भौतिक पिंड का वर्णन नहीं।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।