सभी 7 क्रमांकित श्लोक।
कुज, मंगल, भौम और अंगारक मंगल ग्रह के नाम हैं। इस कवच में लाल वस्त्र, मेष वाहन और आयुधों के साथ मंगल का ध्यान किया गया है।
देवनागरी में पाठ
रक्ताम्बरो रक्तवपुः किरीटी चतुर्भुजो मेषगमो गदाभृत् ।
धरासुतः शक्तिधरश्च शूली सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः ॥ 1 ॥
अङ्गारकः शिरो रक्षेन्मुखं वै धरणीसुतः ।
श्रवौ रक्ताम्बरः पातु नेत्रे मे रक्तलोचनः ॥ 2 ॥
नासां शक्तिधरः पातु मुखं मे रक्तलोचनः ।
भुजौ मे रक्तमाली च हस्तौ शक्तिधरस्तथा ॥ 3 ॥
वक्षः पातु वराङ्गश्च हृदयं पातु रोहितः ।
कटिं मे ग्रहराजश्च मुखं चैव धरासुतः ॥ 4 ॥
जानुजङ्घे कुजः पातु पादौ भक्तप्रियः सदा ।
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे मेषवाहनः ॥ 5 ॥
य इदं कवचं दिव्यं सर्वशत्रुनिवारणम् ।
भूतप्रेतपिशाचानां नाशनं सर्वसिद्धिदम् ॥ 6 ॥
सर्वरोगहरं चैव सर्वसम्पत्प्रदं शुभम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदं नॄणां सर्वसौभाग्यवर्धनम् ।
रोगबन्धविमोक्षं च सत्यमेतन्न संशयः ॥ 7 ॥
पाठ का प्रसंग और भाव
धरणीसुत नाम पृथ्वी से संबंध बताता है और शक्तिधर नाम हाथ में धारण की गई शक्ति यानी भाले का उल्लेख करता है। अलग-अलग नामों से उसी देवता की रक्षा-प्रार्थना की गई है।
स्तुति के अंत में आने वाली फलश्रुति पाठ से जुड़े आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ बताती है। वह आस्था की भाषा है; उसे बीमारी ठीक होने, धन मिलने या किसी हानि से निश्चित बचाव की गारंटी न मानें। यहाँ दिया परिचय भाव समझाने के लिए है, हर शब्द का अनुवाद नहीं।
पढ़ने की विधि
पहले कुछ पंक्तियाँ धीरे पढ़ें। एक दंड (।) विराम और दो दंड (॥) श्लोक की समाप्ति दिखाते हैं। क्रमांक पाठ के श्लोक बताते हैं; वे अनिवार्य जप-संख्या नहीं हैं।
उच्चारण और पाठांतर
संस्कृत में छोटे-बड़े स्वर, अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त अक्षरों पर ध्यान दें। किसी शब्द का उच्चारण स्पष्ट न हो तो जानकार पाठक से सुनें। अलग परंपराओं में शब्द या क्रमांकन कुछ बदल सकता है।
क्या पूरी अनुष्ठान-विधि करनी होगी?
परिचय और पाठ को भक्तिपरक साहित्य के रूप में पढ़ सकते हैं। मंत्र-दीक्षा, न्यास और विस्तृत अनुष्ठान की विधियाँ परंपरा के अनुसार अलग होती हैं। इस पृष्ठ को उन सभी विधियों का प्रशिक्षण न मानें।
संदर्भ: संस्कृत डॉक्युमेंट्स पर इस पाठ का संस्करण। मुख्य पाठ पर ध्यान रखने के लिए अलग विनियोग, न्यास और ग्रंथ-समापन की पंक्तियाँ यहाँ नहीं जोड़ी गई हैं।