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ज्योतिष पाठ - ग्रहों का परिचय (Introduction to Planets)


ज्योतिष शास्त्र में यदि राशियाँ शरीर के समान हैं, तो ग्रह उस शरीर में प्राण फूँकने वाली शक्तियाँ हैं। हमारे जीवन की हर घटना के पीछे किसी न किसी ग्रह का प्रभाव अवश्य होता है। भारतीय ज्योतिष मुख्य रूप से नौ ग्रहों (नवग्रह) की गति के आधार पर फलादेश करता है। आधुनिक समय में हर्षल (यूरेनस), नेप्च्यून और प्लूटो पर भी शोध किया जा रहा है।

1. ग्रहों का राशि स्वामित्व (Planetary Rulership)

प्रत्येक ग्रह का कुछ विशेष राशियों पर अधिकार होता है। राहु और केतु का अपना कोई घर नहीं होता, वे जिस राशि में बैठते हैं, उसके स्वामी के अनुसार फल देते हैं।

ग्रहस्वामित्व वाली राशियाँ
सूर्य (रवि)सिंह राशि
चंद्रमाकर्क राशि
मंगल (कुज)मेष, वृश्चिक
बुधमिथुन, कन्या
गुरु (बृहस्पति)धनु, मीन
शुक्रवृषभ, तुला
शनिमकर, कुंभ

2. विंशोत्तरी दशा - नक्षत्र स्वामी

महर्षि पाराशर ने 27 नक्षत्रों को 9 ग्रहों में विभाजित किया है और प्रत्येक ग्रह को एक निश्चित दशा काल दिया है। इसे विंशोत्तरी दशा पद्धति कहते हैं, जिसकी कुल अवधि 120 वर्ष होती है।

$$6 + 10 + 7 + 18 + 16 + 19 + 17 + 7 + 20 = 120 \text{ वर्ष}$$
ग्रहनक्षत्रदशा अवधि
केतुअश्विनी, मघा, मूल7 वर्ष
शुक्रभरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा20 वर्ष
सूर्यकृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा6 वर्ष
चंद्रमारोहिणी, हस्त, श्रवण10 वर्ष
मंगलमृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा7 वर्ष
राहुआर्द्रा, स्वाती, शतभिषा18 वर्ष
गुरुपुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद16 वर्ष
शनिपुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद19 वर्ष
बुधअश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती17 वर्ष

3. ग्रहों का स्वभाव और मैत्री

फलादेश के लिए ग्रहों के बीच के संबंधों को समझना आवश्यक है, जिसे नैसर्गिक मैत्री कहा जाता है।

  • सूर्य: मित्र (चंद्र, मंगल, गुरु), शत्रु (शनि, शुक्र), सम (बुध)।
  • चंद्र: मित्र (सूर्य, बुध), शत्रु (कोई नहीं), सम (बाकी सभी)।
  • मंगल: मित्र (गुरु, चंद्र, सूर्य), शत्रु (बुध), सम (शुक्र, शनि)।
  • गुरु: मित्र (सूर्य, मंगल, चंद्र), शत्रु (बुध, शुक्र), सम (शनि)।
  • शनि: मित्र (शुक्र, बुध), शत्रु (सूर्य, चंद्र, मंगल), सम (गुरु)।



नोट: इस वेबसाइट पर त्योहारों और ग्रहण की तिथियों की गणना स्विस एफेमेरिस (Swiss Ephemeris) और दृक सिद्धांत के आधार पर की गई है। यहां दर्शाए गए समय आपके चुने गए शहर के अक्षांश और देशांतर के अनुसार समायोजित किए गए हैं, जिसमें सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त की गणना टोपोसेंट्रिक (topocentric) निर्देशांकों का उपयोग करके की गई है। क्षेत्रीय परंपराओं या स्थानीय पंचांग की भिन्नताओं के कारण इसमें मामूली अंतर आ सकता है। किसी भी संदेह की स्थिति में, कृपया अपने स्थानीय पंचांग या पारिवारिक पुरोहित (पंडित जी) से पुष्टि अवश्य कर लें।