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ज्योतिष पाठ - मुहूर्त (Electional Astrology)

"मुहूर्त" का अर्थ है किसी कार्य को शुरू करने के लिए चुना गया "सर्वोत्तम समय"। हम अपने जन्म समय (जातक) को नहीं बदल सकते, लेकिन किसी कार्य को शुरू करने के समय (मुहूर्त) को चुन सकते हैं। एक शुभ मुहूर्त बुरे ग्रहों के प्रभावों को कम कर सकता है और सफलता की संभावना को बढ़ा सकता है।

पंचांग शुद्धि (Panchanga Shuddhi)

मुहूर्त निर्धारित करते समय पंचांग के इन 5 अंगों (पंच + अंग) का शुद्ध और शुभ होना अनिवार्य है:

  1. तिथि (Tithi): रिक्ता तिथियां (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) और अमावस्या शुभ कार्यों के लिए वर्जित हैं। द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी और पूर्णिमा अत्यंत शुभ मानी जाती हैं।
  2. वार (Vara): सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार शुभ कार्यो के लिए श्रेष्ठ हैं। रविवार, मंगलवार और शनिवार को सामान्यतः शुभ कार्यों के लिए नहीं चुना जाता (कुछ विशेष अपवादों को छोड़कर)।
  3. नक्षत्र (Nakshatra): रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, और रेवती - ये शुभ नक्षत्र माने जाते हैं।
  4. योग (Yoga): वैधृति (Vaidhriti) और व्यतीपात (Vyatipata) योगों में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
  5. करण (Karana): विष्टि करण (जिसे 'भद्रा' भी कहते हैं) के समय शुभ कार्य करना निषिद्ध है।

वर्जित समय (Times to Avoid)

  • राहुकाल (Rahu Kalam): इसे विष तुल्य माना जाता है। इस समय शुरू किए गए कार्यों में बाधाएं और असफलता मिलती है।
  • यमगंड (Yamagandam): यह काल मृत्यु तुल्य कष्ट या कार्य के विनाश का सूचक है।
  • दुर्मुहूर्त (Durmuhurtham): यह भी एक अशुभ समय है, जिसमें शुभ कार्य नहीं करने चाहिए।
महत्वपूर्ण सूत्र: प्रतिदिन दोपहर के समय (लगभग 12 बजे) आने वाला "अभिजित मुहूर्त" (Abhijit Muhurat) सभी दोषों का नाश करने वाला माना जाता है। यदि कोई शुभ मुहूर्त न मिल रहा हो, तो आपात स्थिति में इसका उपयोग किया जा सकता है (केवल बुधवार को छोड़कर)।

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नोट: इस वेबसाइट पर त्योहारों और ग्रहण की तिथियों की गणना स्विस एफेमेरिस (Swiss Ephemeris) और दृक सिद्धांत के आधार पर की गई है। यहां दर्शाए गए समय आपके चुने गए शहर के अक्षांश और देशांतर के अनुसार समायोजित किए गए हैं, जिसमें सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त की गणना टोपोसेंट्रिक (topocentric) निर्देशांकों का उपयोग करके की गई है। क्षेत्रीय परंपराओं या स्थानीय पंचांग की भिन्नताओं के कारण इसमें मामूली अंतर आ सकता है। किसी भी संदेह की स्थिति में, कृपया अपने स्थानीय पंचांग या पारिवारिक पुरोहित (पंडित जी) से पुष्टि अवश्य कर लें।