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ज्योतिष पाठ - नवांश कुंडली (Navamsa Chart)


राशि चक्र (D1) के बाद ज्योतिष में सबसे महत्वपूर्ण यदि कोई वर्ग कुंडली है, तो वह नवांश कुंडली (D9) है। एक राशि को 9 बराबर भागों में विभाजित करने पर नवांश बनता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से दो बातों के लिए किया जाता है:

  1. वैवाहिक जीवन (Marriage): जीवनसाथी का स्वभाव कैसा होगा? वैवाहिक सुख मिलेगा या नहीं?
  2. ग्रहों का वास्तविक बल (Real Strength): कोई ग्रह राशि चक्र में मजबूत दिख सकता है, लेकिन क्या वह वास्तव में अंदर से मजबूत है? यह नवांश तय करता है।

वर्गोत्तम ग्रह (Vargottama Planet)

परिभाषा: यदि कोई ग्रह राशि चक्र (D1) में जिस राशि में स्थित हो, नवांश कुंडली (D9) में भी उसी राशि में स्थित हो, तो उसे "वर्गोत्तम" (Vargottama) कहते हैं।

वर्गोत्तम ग्रह अत्यंत शक्तिशाली होता है। भले ही वह राशि चक्र में नीच राशि में क्यों न हो, यदि वह वर्गोत्तम हो जाता है, तो वह शुभ फल ही प्रदान करता है। ऐसे ग्रह जीवन में स्थिरता (Stability) और उच्च पद प्रदान करते हैं।

विषय (Subject) विश्लेषण विधि (Analysis Method)
विवाह (Marriage) नवांश लग्न (D9 Lagna) और नवांश लग्नेश की स्थिति देखनी चाहिए। यदि वे पाप प्रभाव से मुक्त और केंद्र/त्रिकोण में हों, तो वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। साथ ही, D1 के सप्तमेश की स्थिति D9 में जांचें।
भाग्य (Luck) ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 30-35 वर्ष की आयु के बाद नवांश कुंडली का प्रभाव बढ़ जाता है। राशि चक्र (D1) वह है जो हम जन्म से लेकर आए हैं (प्रारब्ध), और नवांश (D9) वह है जो हम अपने कर्मों से बनाते हैं।
पुष्कर नवांश (Pushkaramsa) यदि ग्रह नवांश में कुछ विशिष्ट अंशों (Degrees) पर होते हैं, जिन्हें "पुष्कर अंश" या "पुष्कर नवांश" कहते हैं, तो वे जातक को जीवन भर पोषण, सुरक्षा और विकास प्रदान करते हैं।



नोट: इस वेबसाइट पर त्योहारों और ग्रहण की तिथियों की गणना स्विस एफेमेरिस (Swiss Ephemeris) और दृक सिद्धांत के आधार पर की गई है। यहां दर्शाए गए समय आपके चुने गए शहर के अक्षांश और देशांतर के अनुसार समायोजित किए गए हैं, जिसमें सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त की गणना टोपोसेंट्रिक (topocentric) निर्देशांकों का उपयोग करके की गई है। क्षेत्रीय परंपराओं या स्थानीय पंचांग की भिन्नताओं के कारण इसमें मामूली अंतर आ सकता है। किसी भी संदेह की स्थिति में, कृपया अपने स्थानीय पंचांग या पारिवारिक पुरोहित (पंडित जी) से पुष्टि अवश्य कर लें।