ग्रह दृष्टियाँ - परिचय (Planetary Aspects)
पारंपरिक बल तालिकाओं के प्रतिशत उस पद्धति के तुलनात्मक मान हैं। वे किसी घटना के होने की मापी गई संभावना नहीं हैं।
वैदिक ज्योतिष में, एक ग्रह जिस राशि में स्थित होता है, वहां तो अपना प्रभाव देता ही है, साथ ही वह अन्य राशियों या ग्रहों को भी देखता है। इसे "ग्रह दृष्टि" (Planetary Aspect) कहते हैं। दृष्टि का शाब्दिक अर्थ है "देखना"। ग्रह जहाँ बैठता है वहां 100% फल देता है, और जिस भाव पर उसकी दृष्टि पड़ती है, उस पर भी वह 75% से 100% तक प्रभाव डालता है।
सामान्य नियम (General Rule)
सभी नवग्रह अपने स्थान से ठीक सामने वाले, यानी 7वें भाव (7th House) को "पूर्ण दृष्टि" से देखते हैं। इसे "सप्तम दृष्टि" कहते हैं।
विशेष दृष्टियाँ (Special Aspects)
मंगल, गुरु और शनि के पास 7वीं दृष्टि के अलावा कुछ "विशेष दृष्टियाँ" भी होती हैं। महर्षि पराशर के अनुसार राहु और केतु की भी विशेष दृष्टियाँ मानी गई हैं।
| ग्रह (Planet) | दृष्टि स्थान (अपने स्थान से) |
|---|---|
| सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र | केवल 7वां भाव |
| मंगल (Mars) | 4, 7, 8 (चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टियाँ) |
| गुरु (Jupiter) | 5, 7, 9 (पंचम, सप्तम, नवम दृष्टियाँ) |
| शनि (Saturn) | 3, 7, 10 (तृतीय, सप्तम, दशम दृष्टियाँ) |
| राहु/केतु | 5, 7, 9 (गुरु के समान) - यह कुछ विद्वानों का मत है। |
शुभ दृष्टि और पाप दृष्टि
- शुभ दृष्टि (Benefic Aspect): नैसर्गिक शुभ ग्रह जैसे गुरु, शुक्र, पूर्ण चंद्रमा और शुभ बुध जब किसी भाव को देखते हैं, तो उस भाव का बल बढ़ जाता है। एक प्रसिद्ध कहावत है - "गुरु वीक्षणं - कोटि दोष हरणं" अर्थात गुरु की दृष्टि पड़ने से करोड़ों दोष दूर हो जाते हैं।
- पाप दृष्टि (Malefic Aspect): शनि, मंगल, राहु, और सूर्य (क्रूर ग्रह) जब किसी भाव को देखते हैं, तो उस भाव से संबंधित फलों में कमी, देरी या तनाव उत्पन्न करते हैं।