आज का नित्य संकल्प
किसी भी पूजा, व्रत या संध्यावंदन को शुरू करने से पहले किया जाने वाला पवित्र संकल्प ही 'संकल्प' कहलाता है। यह मन, शरीर, समय और ईश्वर को जोड़ता है। आप अपनी भौगोलिक स्थिति (देश, राज्य) और आज की ग्रहों की स्थिति के आधार पर अपना व्यक्तिगत नित्य संकल्प यहाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, इस सेवा के माध्यम से आप दक्षिण भारत में मुख्य रूप से उपयोग की जाने वाली अमान्त पद्धति और उत्तर भारत में मुख्य रूप से उपयोग की जाने वाली पूर्णिमान्त पद्धति में नित्य संकल्प प्राप्त कर सकते हैं।
- संकल्प भगवान को साक्षी मानकर यह बताने की विधि है कि हम पूजा, व्रत आदि आध्यात्मिक कार्य कब, क्यों और कहाँ कर रहे हैं।
- यह आपके स्थान (देश/राज्य) और समय (तिथि, नक्षत्र) के आधार पर प्रतिदिन बदलता है।
- नित्य पूजा, व्रत या संध्यावंदन जैसे सनातन कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कार्यक्रम से पहले इसका पाठ करना चाहिए।
- इसके लिए एकाग्रता, थोड़ा सा जल और अक्षत की आवश्यकता होती है।
Sankalpam Guide & FAQs
संकल्प क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो, संकल्प का अर्थ है 'एक पवित्र निर्णय'। जिस तरह हम यात्रा शुरू करने से पहले जीपीएस में गंतव्य तय करते हैं, उसी तरह संकल्प पूजा से पहले हमारे आध्यात्मिक गंतव्य को निर्धारित करता है। यह वर्तमान युग, वर्ष, ऋतु, तिथि, वार और पृथ्वी पर हमारे सटीक स्थान का स्मरण कराते हुए हमें भगवान के सामने वर्तमान में स्थापित करता है।
संकल्प क्यों करना चाहिए?
संकल्प करने से यह सुनिश्चित होता है कि पूजा या व्रत का पूरा फल (पुण्य) निश्चित रूप से हमें ही प्राप्त हो। यह मन को भटकने से रोकता है और एकाग्रता प्रदान करता है। यह हमारी व्यक्तिगत पहचान (गोत्र, नाम) को अनंत काल चक्र से जोड़ता है। शास्त्रों के अनुसार, संकल्प के बिना की गई कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है।
किसे करना चाहिए? कब करना चाहिए?
जो लोग घर में प्रतिदिन दीप जलाते हैं, त्योहारों की पूजा, व्रत (जैसे सत्यनारायण स्वामी व्रत, वरलक्ष्मी व्रत) या त्रिकाल संध्यावंदन करते हैं, उन सभी को संकल्प पढ़ना चाहिए। पूजा की शुरुआत में, आचमन और प्राणायाम के तुरंत बाद इसका पाठ करना चाहिए।
संकल्प के लिए क्या चाहिए?
इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है एक शुद्ध मन। भौतिक रूप से, अपने दाहिने हाथ में आचमनी से थोड़ा सा जल, या कुछ अक्षत (पीले चावल) और फूल लेकर संकल्प मंत्र पढ़ें। मंत्र पूरा होने के बाद, जल या अक्षत को भगवान के चरणों में या एक प्लेट में छोड़ दें।